
Sunday, 3 July 2016
नवग्रह स्तोत्र अथ

Friday, 1 July 2016
कन्या लग्न कन्या राशि का परिचय
कन्या लग्न कन्या
राशि का परिचय
|कन्या राशि भचक्र
में छठे स्थान
पर आने वाली
राशि है. इस
राशि का स्वामी
बुध होता है
और इसे सभी
ग्रहों में राजकुमार
की उपाधि प्रदान
की गई है.
इसलिए इसके प्रभाव
वाला व्यक्ति भी
स्वयं को राजकुमार
से कम नहीं
समझता है
यह राशि स्वभाव
से द्वि-स्वभाव
राशि के अन्तर्गत
आती है. इस
राशि का तत्व
पृथ्वी है और
पृथ्वी तत्व होने
से इसमें सहनशक्ति
भी होती है.
इस राशि का
प्रतीक चिन्ह एक लड़की
है जो नाव
में सवार है
और उसके एक
हाथ में गेहूँ
की बालियाँ व
दूसरे में लालटेन
है जो मानव
सभ्यता का विकास
दिखाती है. लालटेन
को प्रकाश का
प्रतीक माना गया
है. नाव में
सवार यह निरंतर
आगे बढ़ने की
प्रेरणा देती है.
कन्या राशि का
व्यक्तित्व | आइए एक
नजर कन्या राशि
की विशेषताओं पर
भी डालते हैं.
कालपुरुष की कुंडली
में यह राशि
छठे भाव में
पड़ती है और
छठा भाव रोग,
ऋण व शत्रुओ
का माना जाता
है. इसी भाव
से प्रतियोगिताएँ व
प्रतिस्पर्धाएँ भी देखी
जाती हैं.
जब यह राशि
लग्न में उदय
होती है तब
व्यक्ति को जीवन
में बहुत सी
प्रतिस्पर्धाओ का सामना
करना पड़ता है.
इसलिए यदि आपका
कन्या लग्न होने
पर आपको जीवन
में बिना प्रतिस्पर्धा
के शायद ही
कुछ मिले. जीवन
में एक बार
थोड़ा संघर्ष करना
ही पड़ता है.
कन्या राशि के
प्रभाव से आपके
भीतर संघर्षों से
लड़ने की क्षमता
होती है क्योकि
यह राशि पृथ्वी
तत्व राशि मानी
गई है इसलिए
यह परिस्थिति से
पार निकलने में
सक्षम होती है.
बुध को बौद्धिक
क्षमता का कारक
माना गया है
इसलिए बुध के
प्रभाव से आप
बुद्धिमान व व्यवहार
कुशल व्यक्ति होते
हैं.
आप तर्क-वितर्क
में भी कुशल
होते हैं और
हाजिर जवाब भी
होते हैं. आपके
इसी गुण के
कारण सभी लोग
आपसे प्रभावित रहते
हैं. आप स्वभाव
से संकोची व
शर्मीले होते हैं
और आप आसानी
से लोगो से
मिलते-जुलते नहीं
हैं, थोड़े झिझकने
वाले व्यक्ति होते
हैं. आप जीवन
में कम्यूनिकेशन व
पढ़ने-लिखने वाले
कामों में सफलता
ज्यादा पा सकते
हैं.
कन्या लग्न के
लिए शुभ ग्रह
| कन्या लग्न के
लिए शुभ ग्रहो
की बात करते
हैं. कन्या लग्न
का स्वामी बुध
लग्नेश होने से
शुभ हो जाता
है. शुक्र भाग्य
भाव का स्वामी
होने से शुभ
होता है. भाग्य
भाव कुंडली का
नवम भाव है
जो कि सबसे
अधिक बली त्रिकोण
माना गया है.
शनि कुंडली के पंचम
व छठे भाव
दोनो का स्वामी
होता है. पंचम
का स्वामी होने
से शनि शुभ
ही होता है
लेकिन छठे भाव
के गुण भी
दिखा सकता है
यदि कुंडली में
इसकी स्थिति सही
नही है तो.
सभी शुभ माने
जाने वाले ग्रहों
की शुभता कुंडली
में इनकी स्थिति
पर निर्भर करती
है. यदि यह
कुंडली में निर्बल
हैं तब इनकी
दशा/अन्तर्दशा में
शुभ फलों में
कमी हो सकती
है.
कन्या लग्न के
लिए अशुभ ग्रह
|शुभ ग्रहो के
बाद अब कन्या
लग्न के लिए
अशुभ ग्रहो की
भी बात करते
हैं. इस लग्न
के लिए बृहस्पति
बाधकेश का काम
करता है. कन्या
लग्न द्वि-स्वभाव
राशि होती है
और द्वि-स्वभाव
राशि के लिए
सप्तमेश बाधक ग्रह
माना गया है.
बृहस्पति की दोनो
राशियाँ केन्द्रों में पड़ती
है इसलिए बृहस्पति
को केन्द्राधिपति होने
का दोष भी
लगता है. सूर्य
इस लग्न के
लिए बारहवें भाव
का स्वामी होने
से शुभ नही
होता हैं. चंद्रमा
भले ही इस
लग्न के लिए
एकादश भाव के
स्वामी होकर लाभ
देने वाले हैं
लेकिन त्रिषडाय के
स्वामी होने से
अशुभ बन जाते
है.
मंगल इस लग्न
के लिए अत्यंत
अशुभ है क्योकि
दो अशुभ भावों
के स्वामी होते
हैं. कन्या लग्न
में मंगल तीसरे
व अष्टम भाव
के स्वामी होते
है और दोनो
ही भाव शुभ
नही माने जाते
हैं.
कन्या लग्न के
लिए शुभ रत्न
|अंत में आपको
शुभ रत्नो की
जानकारी दी जाती
है. इस लग्न
के लिए पन्ना,
डायमंड व नीलम
शुभ रत्न माने
गए हैं. पन्ना
बुध के लिए,
डायमंड शुक्र के लिए
व नीलम शनि
के लिए पहना
जाता है.
आप यदि महंगे
रत्न नहीं खरीद
सकते तब इनके
उपरत्न भी पहन
सकते हैं. पन्ना
के लिए हरा
टोपाज, डायमंड के लिए
जर्कन या ओपल
व नीलम के
लिए नीली या
लाजवर्त भी पहने
जा सकते हैं.
जिस ग्रह की
दशा कुंडली में
चल रही हो
उससे संबंधित मंत्र
का जाप नियमित
रुप से करना
चाहिए. इससे अशुभ
फलों में कमी
आती है और
शुभ फलो की
बढ़ोतरी होती है
पन्ना बुधवार के दिन
अश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती,
नक्षत्र हो उस
दिन सूर्योदय से
लगभग 10 बजे तक
पन्ना पहन सकते
हैं। पन्ना सदैव
स्वर्ण की धातु
में शुभ घड़ी
में बनाकर ही
पहनें। पन्ना कम से
कम 3 कैरेट का
होना चाहिए व
उससे अधिक हो
तो उत्तम रहेगा।
पन्ना रत्न धारण
करने से पहले
इस बात का
सबसे पहले ध्यान
रखना चाहिए की
रत्न को उसी
के नक्षत्र में
धारण करना चाहिए
। जैसे की
पन्ना को बुध
के नक्षत्र में
जैसे की आश्लेषा
ज्येष्ठा रेवती में या
बुधवार या बुधपुष्य
नक्षत्र धारण बुध
के होरे में
धारण करना चाहिए
इस बात ध्यान
रखना चाहिए कि
उस समय राहु
काल ना हो
बुध ग्रह का मंत्र ॐ नमो अर्हते भगवते श्रीमते मल्लि तीर्थंकराय कुबेरयक्ष |
अपराजिता यक्षी सहिताय ॐ
आं क्रों ह्रीं
ह्र: बुधमहाग्रह मम
दुष्टग्रह
रोग कष्ट
निवारणं सर्व शान्तिं
च कुरू कुरू
हूं फट् | 14000 जाप्य |
मध्यम यंत्र ॐ
ह्रौं क्रौं आं
श्रीं बुधग्रहारिष्ट
निवारक श्री विमल
अनन्तधर्म शान्ति
कुन्थअरहनमिवर्धमान अष्टजिनेन्द्रेभ्यो नम:
शान्तिं कुरू कुरू
स्वाहा || 8000 जाप्य || लघु
मंत्र ॐ ह्रीं
णमो उवज्झायाणां
|| 10000 जाप्य |
बुध मंत्र ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने
प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते
सं सृजेधामयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च
सीदत।।
नवग्रह मंत्र और जप
संख्या इस प्रकार
से हैं
बुध ॐ
ब्रां ब्रीं ब्रौं
स: बुधाय नमः
जप संख्या 9000
जप समय
मध्याह्न काल
बुध स्तुति जय शशिनन्दन
बुध महाराजा। करहु
सकल जन कहं
शुभ काजा।।
दीजै बुद्धि सुमति बल
ज्ञाना। कठिन कष्ट
हरि हरि कल्याना।
हे तारासुत रोहिणि नन्दन।
चन्द्र सुवन दुःख
दूरि निकन्दन।।
पूजहू आसदास कहं स्वामी।
प्रणत पाल प्रभु
नमो नमामी।।
वृष लग्न हीरा - वृषभ लगन के लिये शुक्र लग्नेश है ।
वृष लग्न हीरा
- वृषभ लगन के
लिये शुक्र लग्नेश
है । अतः
इस लगन के
जातक के लिये
हीरा स्वास्थ्य - लाभ
, आयु वृद्धि तथा
जीवन मे उन्नति
प्राप्ति के लिये
सदा हीरा धारण
कर सकते है
हीरा आपका जीवन
रत्न है
मणिक्य - वृष लगन
कुंडली मे सूर्य
चतुर्थ केंद्र भाव का
स्वामी है परंतु
सूर्य लग्नेश शुक्र
का शत्रु है
इसलिये इस लगन
के जातक को
मणिक्य सूर्य की महादशा
मे ही धारण
करना चाहिये अन्यथा
उन्हें लाभ नहीं
बल्कि हानिकारक सिद्ध
होगा मणिक्य धारण
करने से पहले
अपने की सलाह
जरुर ले जिसको
यह धारण करना
आवश्यक है
मोती - वृष लगन
की कुंडली मे
चन्द्रमा तृतीय भाव का
स्वामी है इस
लगन के जातक
को कभी भी
मोती धारण नहीं
करना चाहिये
मूंगा - वृष लगन
मे मंगल बाहरवें
भाव और सातवे
भाव का स्वामी
होगा अतः इस
लगन के जातक
को मूंगा नहीं
पहनना चाहिये
पन्ना - वृष लगन
मे बुध दूसरे
और पंचम त्रिकोण
का स्वामी होकर
एक योग कारक
ग्रह बन जाता
है ।इसके कारण
से जातक को
पारिवारिक शांति व् धन
- लाभ बुद्धि - बल
संतान सुख यश
-मान तथा भाग्य
कि उनत्ति होती
है बुध की
महादशा और अंतरदशा
मे पन्ना धारण
करना अति लाभकारी
होता है यदि
इस लगन के
जातक पन्ने को
हीरे के साथ
पहने तो जीवन
मे समृद्धि देगा
पुखराज - वृष लगन
के लिये गुरु
अष्टम और एकादश
भाव का स्वामी
होता है गुरु
वृषभ के लिये
शुभ नहीं माना
जाता इसके अतिरिक्त
लग्ननेश और बृहस्पति
मे परस्पर मित्रता
नहीं हैं तब
भी यदि एकादश
का स्वामी होकर
बृहस्पति दूसरे चोथे पाचवे
नवम या लगन
मे स्थित हो
तो गुरु की
महादशा और अंतरदशा
पीले पुखराज को
धारण करने से
धन लाभ मे
वृधि होती हैं
नीलम - वृषभ लगन
के लिये शनि
नवम और दशम
भावो का स्वामी
होने के कारण
अत्यन्त शुभ और
योग कारक ग्रह
माना गया है
। इसके धारण
करने से सदा
सुख - सम्पदा , समृधि
,मान - प्रतिष्ठा तथा धन
कि प्राप्ति होती
है । यदि
नीलम लग्ननेश रत्न
हीरे के साथ
धारण किया जाये
तो अति लाभकारी
होता है।
इस राशि का
रंग सफेद माना
गया है, शायद
इसी कारण इस
राशि के व्यक्ति
सुंदर व गौर
वर्ण के होते
हैं. इस राशि
का प्रतीक चिन्ह
इसके नामानुसार वृष
अर्थात बैल है.
बैल जैसा अड़ियल
रुख इस राशि
के जातकों में
दिखाई देता है.
वृष लग्न के
लिए शुभ ग्रह
|
आइए अब आपके
लिए शुभ ग्रहो
का वर्ण्न कर
दें. वृष राशि
का स्वामी शुक्र
ग्रह होता है
और इसकी दूसरी
राशि छठे भाव
में पड़ती है.
छठे भाव को
अच्छा नहीं माना
जाता है. बेशक
छठा भाव शुभ
नहीं होता है
लेकिन दूसरी राशि
छठे में पड़ने
पर भी शुक्र
को लग्नेश होने
के कारण शुभ
ही माना जाता
है
बुध इस लग्न
के लिए धनेश
व पंचमेश होने
से आपको शुभ
फल प्रदान करेगा,
बशर्ते कि वह
कुंडली में पीड़ित
अवस्था मे ना
हो. शनि इस
लग्न के लिए
योगकारी ग्रह होने
से अत्यंत शुभ
होता है. आपका
लग्न वृष होने
से शनि नवमेश
व दशमेश होकर
केन्द्र त्रिकोण का स्वामी
बन जाता है
और शुभ फल
प्रदान करता है.
शनि आपकी जन्म
कुण्डली में सबसे
बली केन्द्र का
स्वामी होता है
और सबसे बली
त्रिकोण के भी
स्वामी बन जाते
है.
वृष लग्न के
लिए अशुभ ग्रह
आइए अब आपको
अशुभ ग्रहों के
बारे में बता
दें. आपका वृष
लग्न होने से
चंद्रमा तृतीयेश होकर अशुभ
बन जाता है.
सूर्य चतुर्थेश होने
से सम हो
जाते है क्योकि
चतुर्थ भाव आपके
केन्द्र स्थान में पड़ता
है और यह
सम स्थान होता
है
आपकी कुंडली में मंगल
सप्तमेश व द्वादशेश
होने से अत्यंत
अशुभ माना गया
हैं. गुरु भी
अष्टमेश व एकादशेश
होने से अशुभ
होता है. आठवाँ
भाव बाधाओं व
रुकावटो का होता
है. यह त्रिक
स्थान भी है.रत्न परामर्श
यदि आप महंगा
रत्न नही खरीद
सकते हैं तब
आप इन रत्नों
के उपरत्न पहन
सकते हैं. यदि
आपकी कुंडली में
शुभ ग्रह कमजोर
हैं तभी उनका
रत्न पहने अन्यथा
नही पहने. आपके
लिए शनि और
बुध के मंत्र
जाप करना सदा
शुभ रहेगा. शनि
आपका भाग्येश है
और बुध आपको
सुख, समृद्धि व
धन प्रदान करने
वाला ग्रह हैशुक्रस्य
मन्त्रः - आगमशिरोमणौ ॐ ऐं
जं गं ग्रहेश्वराय
शुक्राय नमः॥
शुक्र ॐ शुं
शुक्राय नम:।।
ॐ ह्रीं श्रीं
शुक्राय नम:।
शुक्र गायत्री मंत्र :-ॐ
भृगुसुताय विद्महे दिव्येदेहाय धीमहि
!
तन्न: शुक्र : प्रचोदयात !
शुक्र देव के
सामान्य मन्त्र : ॐ शुं
शुक्राय नमः
शुक्र देव के
बीज मन्त्र : ॐ
द्राम
द्रीम द्रौम सः शुक्राय
नमः
शुक्र देव के
गायत्री मन्त्र : ॐ शुक्राय
विद्महे , शुक्लाम्बर - धरः , धीमहि तन्न:
शुक्र प्रचोदयात "
शुक्र देव के
वैदिक मन्त्र : ॐ
अन्नात्परिश्रुतो रसं ब्रह्म्न्नाव्य
पिबत् - क्षत्रम्पयः सोमम्प्रजापति ! ऋतेन
सत्यमिन्द्रिय्वीपानं-गुं -शुक्र्मन्धस्य
- इन्द्रस्य -
इन्द्रियम
- इदं पयो - अमृतं
मधु ! शुक्र देव
के पौराणिक मन्त्र
: ॐ हिमकुंद - मृनालाभं
दैत्यानां परमं गुरुं
! सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रन्माम्य्हम
ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा
व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं
प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं
पयोऽमृतं मधु।।
नवग्रह मंत्र और जप
संख्या इस प्रकार
से हैं
शुक्र ॐ
द्रां द्रीं द्रौं
स: शुक्राय नमः
जप संख्या 18000
जप समय
ब्रह्मवेला
शुक्र स्तुति
शुक्रदेव तव पद
जल जाता। दास
निरन्तर ध्यान लगाता।।
हे उशना भार्गव
भृगुनन्दन। दैत्य पुरोहित दुष्ट
निकन्दन।।
भृगुकुल भूषण दूषण
हारी। हरहू नेष्ट
ग्रह करहु सुकारी।।
तुहि पण्डित जोषी द्विजराजा।
तुम्हारे रहत सहत
सब काजा।।
वृष लग्न में
हीरा रत्न धारण
करने से पहले
इस बात का
सबसे पहले ध्यान
रखना चाहिए की रत्न
को उसी के
नक्षत्र में धारण
करना चाहिए ।
जैसे की हीरा
को शुक्र के
नक्षत्र में जैसे
की भरणी पूर्वाफाल्गुनी
पूर्वाषाढा में या
शुक्रवार या शुक्रपुष्य
नक्षत्र धारण शुक्र
के होरे में
धारण करना चाहिए
इस बात ध्यान
रखना चाहिए कि
उस समय राहु
काल ना हो