Friday, 1 July 2016

वृष लग्न हीरा - वृषभ लगन के लिये शुक्र लग्नेश है ।

वृष लग्न हीरा - वृषभ लगन के लिये शुक्र लग्नेश है अतः इस लगन के जातक के लिये हीरा स्वास्थ्य - लाभ , आयु वृद्धि तथा जीवन मे उन्नति प्राप्ति के लिये सदा हीरा धारण कर सकते है हीरा आपका जीवन रत्न है

मणिक्य - वृष लगन कुंडली मे सूर्य चतुर्थ केंद्र भाव का स्वामी है परंतु सूर्य लग्नेश शुक्र का शत्रु है इसलिये इस लगन के जातक को मणिक्य सूर्य की महादशा मे ही धारण करना चाहिये अन्यथा उन्हें लाभ नहीं बल्कि हानिकारक सिद्ध होगा मणिक्य धारण करने से पहले अपने की सलाह जरुर ले जिसको यह धारण करना आवश्यक है

मोती - वृष लगन की कुंडली मे चन्द्रमा तृतीय भाव का स्वामी है इस लगन के जातक को कभी भी मोती धारण नहीं करना चाहिये

मूंगा - वृष लगन मे मंगल बाहरवें भाव और सातवे भाव का स्वामी होगा अतः इस लगन के जातक को मूंगा नहीं पहनना चाहिये

पन्ना - वृष लगन मे बुध दूसरे और पंचम त्रिकोण का स्वामी होकर एक योग कारक ग्रह बन जाता है ।इसके कारण से जातक को पारिवारिक शांति व् धन - लाभ बुद्धि - बल संतान सुख यश -मान तथा भाग्य कि उनत्ति होती है बुध की महादशा और अंतरदशा मे पन्ना धारण करना अति लाभकारी होता है यदि इस लगन के जातक पन्ने को हीरे के साथ पहने तो जीवन मे समृद्धि देगा

पुखराज - वृष लगन के लिये गुरु अष्टम और एकादश भाव का स्वामी होता है गुरु वृषभ के लिये शुभ नहीं माना जाता इसके अतिरिक्त लग्ननेश और बृहस्पति मे परस्पर मित्रता नहीं हैं तब भी यदि एकादश का स्वामी होकर बृहस्पति दूसरे चोथे पाचवे नवम या लगन मे स्थित हो तो गुरु की महादशा और अंतरदशा पीले पुखराज को धारण करने से धन लाभ मे वृधि होती हैं

नीलम - वृषभ लगन के लिये शनि नवम और दशम भावो का स्वामी होने के कारण अत्यन्त शुभ और योग कारक ग्रह माना गया है इसके धारण करने से सदा सुख - सम्पदा , समृधि ,मान - प्रतिष्ठा तथा धन कि प्राप्ति होती है यदि नीलम लग्ननेश रत्न हीरे के साथ धारण किया जाये तो अति लाभकारी होता है।

 

इस राशि का रंग सफेद माना गया है, शायद इसी कारण इस राशि के व्यक्ति सुंदर गौर वर्ण के होते हैं. इस राशि का प्रतीक चिन्ह इसके नामानुसार वृष अर्थात बैल है. बैल जैसा अड़ियल रुख इस राशि के जातकों में दिखाई देता है.

वृष लग्न के लिए शुभ ग्रह |

आइए अब आपके लिए शुभ ग्रहो का वर्ण्न कर दें. वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह होता है और इसकी दूसरी राशि छठे भाव में पड़ती है. छठे भाव को अच्छा नहीं माना जाता है. बेशक छठा भाव शुभ नहीं होता है लेकिन दूसरी राशि छठे में पड़ने पर भी शुक्र को लग्नेश होने के कारण शुभ ही माना जाता है

बुध इस लग्न के लिए धनेश पंचमेश होने से आपको शुभ फल प्रदान करेगा, बशर्ते कि वह कुंडली में पीड़ित अवस्था मे ना हो. शनि इस लग्न के लिए योगकारी ग्रह होने से अत्यंत शुभ होता है. आपका लग्न वृष होने से शनि नवमेश दशमेश होकर केन्द्र त्रिकोण का स्वामी बन जाता है और शुभ फल प्रदान करता है. शनि आपकी जन्म कुण्डली में सबसे बली केन्द्र का स्वामी होता है और सबसे बली त्रिकोण के भी स्वामी बन जाते है.

वृष लग्न के लिए अशुभ ग्रह

आइए अब आपको अशुभ ग्रहों के बारे में बता दें. आपका वृष लग्न होने से चंद्रमा तृतीयेश होकर अशुभ बन जाता है. सूर्य चतुर्थेश होने से सम हो जाते है क्योकि चतुर्थ भाव आपके केन्द्र स्थान में पड़ता है और यह सम स्थान होता है

आपकी कुंडली में मंगल सप्तमेश द्वादशेश होने से अत्यंत अशुभ माना गया हैं. गुरु भी अष्टमेश एकादशेश होने से अशुभ होता है. आठवाँ भाव बाधाओं रुकावटो का होता है. यह त्रिक स्थान भी है.रत्न परामर्श

यदि आप महंगा रत्न नही खरीद सकते हैं तब आप इन रत्नों के उपरत्न पहन सकते हैं. यदि आपकी कुंडली में शुभ ग्रह कमजोर हैं तभी उनका रत्न पहने अन्यथा नही पहने. आपके लिए शनि और बुध के मंत्र जाप करना सदा शुभ रहेगा. शनि आपका भाग्येश है और बुध आपको सुख, समृद्धि धन प्रदान करने वाला ग्रह हैशुक्रस्य मन्त्रः - आगमशिरोमणौ ऐं जं गं ग्रहेश्वराय शुक्राय नमः॥

शुक्र शुं शुक्राय नम:।। ह्रीं श्रीं शुक्राय नम:

शुक्र गायत्री मंत्र :- भृगुसुताय विद्महे दिव्येदेहाय धीमहि !

तन्न: शुक्र : प्रचोदयात !

शुक्र देव के सामान्य मन्त्र : शुं शुक्राय नमः  शुक्र देव के बीज मन्त्र : द्राम

द्रीम द्रौम सः शुक्राय नमः

शुक्र देव के गायत्री मन्त्र : शुक्राय विद्महे , शुक्लाम्बर - धरः , धीमहि तन्न: शुक्र प्रचोदयात "

शुक्र देव के वैदिक मन्त्र : अन्नात्परिश्रुतो रसं ब्रह्म्न्नाव्य पिबत् - क्षत्रम्पयः सोमम्प्रजापति ! ऋतेन सत्यमिन्द्रिय्वीपानं-गुं -शुक्र्मन्धस्य - इन्द्रस्य -

इन्द्रियम - इदं पयो - अमृतं मधु ! शुक्र देव के पौराणिक मन्त्र : हिमकुंद - मृनालाभं दैत्यानां परमं गुरुं ! सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रन्माम्य्हम 

अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:

ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

नवग्रह मंत्र और जप संख्या इस प्रकार से हैं

शुक्र  द्रां द्रीं द्रौं : शुक्राय नमः

जप संख्या  18000

जप समय  ब्रह्मवेला

शुक्र स्तुति

शुक्रदेव तव पद जल जाता। दास निरन्तर ध्यान लगाता।।

हे उशना भार्गव भृगुनन्दन। दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन।।

भृगुकुल भूषण दूषण हारी। हरहू नेष्ट ग्रह करहु सुकारी।।

तुहि पण्डित जोषी द्विजराजा। तुम्हारे रहत सहत सब काजा।।

वृष लग्न में हीरा रत्न धारण करने से पहले इस बात का सबसे पहले ध्यान रखना चाहिए की  रत्न को उसी के नक्षत्र में धारण करना चाहिए जैसे की हीरा को शुक्र के नक्षत्र में जैसे की भरणी पूर्वाफाल्गुनी पूर्वाषाढा में या शुक्रवार या शुक्रपुष्य नक्षत्र धारण शुक्र के होरे में धारण करना चाहिए इस बात ध्यान रखना चाहिए कि उस समय राहु काल ना हो

 

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