Saturday, 14 May 2016

84 रत्नों को ही मान्यता प्राप्त है। 9 मुख्य रत्न ,,, माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद और

84 रत्नों को ही मान्यता प्राप्त है। 9 मुख्य रत्न , माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद और लहसुनिया नवरत्न की श्रेणी में प्रतिष्ठित हैं। इन नवरत्नों के अलावा जो रत्न हैं उन्हें उपरत्न कहा जाता है। कठोरता, टिकाउपन, चमक दमक, पारदर्शिता में ये उपरत्न पीछे नहीं हैं। विभिन्न उपरत्नों की पहचान इस प्रकार है।

1. सुनहला: सुनहरे रंग वाला यह रत्न पारदर्शी होता है।

2. कटैला: यह पारदर्शी और हल्के बैंगनी रंग का होता है।

3. स्फटिक: सफेद बिल्लौर ही स्फटिक कहलाता है।

4. दाना--फिरंग: यह हरे रंग का रत्न है।

5. फिरोजा: यह अपारदर्शी रत्न आसमानी रंग का होता है।

6. जबरजद: आभायुक्त यह रत्न हरे रंग का होता है।

7. तुरमुली: यह विभिन्न रंगों में मिलता है।

8 ओपल: यह प्रायः श्वेत वर्ण का होता है और इसमें रंग -बिरंगे चकत्ते होते हैं।

9. संग सितारा: गेहुएं रंग का यह अपारदर्शी रत्न सुनहरे रंगों से युक्त होता है।

10. जिरकाॅन: यह प्रायः श्वेत वर्ण का होता है। यह अन्य रंगों में भी उपलब्ध होता है।

11. माह --मरियम: यह मटमैले से रंग का होता है। इस पर पीले रंग की आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल सा होता है।

12. गन मेटल: यह काले रंग का चमकदार रत्न है। यह शनि का उपरत्न है।

13. लाजवर्त: यह नील वर्ण का होता है। इसकी सतह पर चांदी और स्वर्ण के रंग के धब्बे स्पष्ट देखे जा सकते हैं। यह शनि का उपरत्न है।

14. तामड़ा: यह गहरे लाल रंग का तथा कालापन लिए होता है। यह माणिक्य का उपरत्न है।

15. चंद्रकांत मणि: गोदंती नाम से प्रचलित यह मणि मोती का उपरत्न है।

16. मकनातीस: यह काले रंग का चमकदार पत्थर है, इसे चुंबक भी कहते हैं। यह शनि का उपरत्न है।

17. काला स्टार: काले रंग के इस पत्थर की सतह पर चमकीला सा तारा स्पष्ट दिखाई देता है। यह शनि का उपरत्न है।

18 टाइगर: इस रत्न की सतह पर शेर की खाल की तरह पीली तथा काली धारियां होती हैं।

19. मरगज: यह हरे तथा नीले रंग का रत्न होता है। इसे बुध तथा शनि का उपरत्न माना जाता है।

20. आॅनेक्स: यह हरे तथा नीले रंग में मिलता है। यह भी शनि तथा बुध का उपरत्न है।

21. अकीक: यह विभिन्न रंगों में मिलता है। रंगानुसार यह विभिन्न राशियों पर उपरत्न के रूप में धारण करवाया जाता है।

22. सुलेमानी: काले रंग के इस उपरत्न पर सफेद रंग की धारियां होती हैं। यह शनि के उपरत्न के रूप में प्रयोग किया जाता है।

23. यमनी: लाल आॅनेक्स को भी यमनी अकीक कहा जाता हैं यह लाल रंग का होता है। मंगल के उपरत्न के रूप में यह धारण करवाया जाता है।

24. बेरूज: यह हल्के रंग का होता है। यह पन्ने का उपरत्न है।

25. धुनैला: यह सुनहरे तथा धुएं के मिश्रित रंग का होता है। यह पुखराज का उपरत्न है।

26. सजरी अथवा शजर : यह भी अकीक की श्रेणी का उपरत्न है तथा विभिन्न रंगों में मिलता है। रंगानुसार राशि द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

27. हालदिली अथवा हालन : यह सफेद तथा हरे रंग के मिश्रित रंगों का उपरत्न है। यह दिल को पुष्ट बनाता है।

28 अलेक्जैंडर: यह जामुनी रंग का उपरत्न है तथा नीलम के उपरत्न के रूप में प्रयोग किया जाता है।

29. लालड़ी: गुलाबी रंग का यह रत्न सूर्य का उपरत्न है।

30. रोमनी: यह लाल तथा कुछ-कुछ कालापन लिए होता है। यह सूर्य तथा मंगल का उपरत्न है।

31. नरम: यह लाल में कुछ-कुछ पीलापन लिए होता है। यह माणिक्य का उपरत्न है।

32. लूधिया अथवा लूधना : यह लाल रंग का उपरत्न है।

33. सिंदूरिया: यह गुलाबी रंग में कुछ-कुछ सफेदी लिए होता है।

34. नीली: नीलम का हम शक्ल यह रत्न नीलम का उपरत्न है।

35. पितौनिया: हरे से रंग के इस पत्थर पर लाल रंग के धब्बे होते हैं।

36. बांसी: हल्के हरे रंग का यह रत्न पन्ने का उपरत्न है।

37. द्रर्वेनक अथवा दूर--नजफः यह कच्चे धान के रंग सा उपरत्न होता है।

38. आलेमानी: यह सुलेमानी अकीक की श्रेणी का उपरत्न है। भूरे रंग पर इसमें काली धारियां होती हैं।

39. जजेमानी: यह भूरे से रंग का रत्न है। इस पर क्रीम रंग की धारियां होती हैं।

40. सीवार: यह हरे रंग का होता है तथा इसमें भूरे रंग की धारियां होती हैं।

41. तुरसावा: यह गुलाबी तथा पीला रंग मिश्रित उपरत्न है।

42. अह्ना: यह गुलाबी से रंग का होता है।

43. आबरी: यह काले रंग का होता है।

44. कुदूरत: यह काले रंग का सफेद और पीले धब्बेदार होता है।

45. कसौटी: यह काले रंग का होता है। इससे असली सोने की परख होती है।

46. कहरुवा अर्थात तृणमणि: यह लाल अथवा पीले रंग का होता है।

47. संगसन: यह सफेद तथा अंगूरी रंग का होता है।

48. लारु: यह मकराने पत्थर की श्रेणी का उपरत्न है।

49. संगमरमर: यह विभिन्न रंगों में मिलता है।

50. दारेचना: कत्थई रंग के इस पत्थर में पीले रंग के धब्बे होते हैं।

51.हकीक-कल -बहार: इसका रंग कुछ पीलापन लिए होता है।

52. हालन: यह गुलाबी से रंग का पत्थर है।

53. चित्ती: काले रंग के इस उपरत्न पर सुनहरी धारियां होती हैं।

54. झरना: यह मटमैले रंग का होता है।

55. संग बसरी: इससे सुरमा भी बनाया जाता है।

56. दांतला: यह सफेद तथा हरे रंग का होता है।

57. मकड़ा: हल्के काले रंग के इस पत्थर पर मकड़ी का जाला सा बना होता है।

58. संगिया: यह सेलखड़ी से मिलते जुलते रंग का होता है।

59. गुदड़ी: यह पीले रंग का होता है।

60. कांसला: यह सफेद तथा हरे रंगा का होता है।

61. सिफरी: यह पत्थर नीले तथा हरे रंग के मिश्रण सा होता है।

62. हरीद: यह काला तथा भूरापन लिए होता है।

63. हवास: यह कुछ कुछ सुनहरे से रंग का होता है।

64. सिंगली: यह लाल तथा कुछ-कुछ कालापन लिए होता है।

65. ढेडी: यह काले से रंग का पत्थर होता है।

66. गौरी: इस पत्ािर में अनेक रंगों की धारियां होती हैं।

67. सीया: यह काले रंग का पत्थर है।

68. सीमाक: यह कुछ पीलापन लिए हुए काले रंग का पत्थर है।

69. मूसा: यह सफेद तथा मटमैले रंग का पत्थर है।

70. पनघन: यह हरापन लिए हुए काले से रंग का पत्थर है।

71. अमलीया: यह हल्का कालापन लिए गुलाबी रंग का पत्थर है।

72. डूर: यह कत्थई रंग का होता है।

73. तिलियर: यह काले रंग का होता है तथा इस पर सफेद रंग के छींटे से होते हैं।

74. खारा: यह हरे से रंग का पत्थर है।

75. पाराजहर अथवा पायेजहर: यह सफेद रंग का पत्थर है।

76. मुबेन जफ: सफेद रंग के इस उपरत्न पर काली सी धारियां होती हैं।

77. सेलखड़ी: यह सफेद से रंग का चिकना पत्थर होता है।

78. जहरमोहरा: यह सफेद-काले से रंग का पत्थर है।

79. रवात: यह लाल तथा

Saturday, 7 May 2016

27 नक्षत्रों के वेद मंत्र

27 नक्षत्रों के वेद मंत्र
1  अश्विनी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ अश्विनौ तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वतीवीर्य्यम वाचेन्द्रो बलेनेन्द्रायदद्युरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ==5000

   2 भरणी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ यमाय त्वाङ्गिरस्य्ते पितृिमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे । 10000

   3 कृतिका नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ अयमग्नि सहस्रीणो वाजयस्य शान्ति (गुं) वनस्पति: मूर्द्धा कबोरयीणाम् । अग्नये नम: 10000

   4 रोहिणी नक्षत्र वेद मंत्र: ===ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचे  वेन आवय: सबुधन्या उपमा अस्यविष्ठा: सतश्चयोनिमसतश्चविध:I  ॐ ब्रहमणे नम: ====5000

   5 मृगशिरा नक्षत्र वेद मंत्र:====ॐ सोमोधनु (गुं) सोमाअवंतुमाशु (गुं) सोमवीर: कर्मणयंददाती यदत्यविदध्य (गुं) सभेयमपितृ श्रवणयोम। ॐ चन्द्रमसे नम: । 10000

   6 आर्द्रा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यामुतते नम: । ॐ रुद्राय नम: ==10000

   7 पुनर्वसु नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता: स पिता स पुत्र: विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातिमादितिर्रजनित्वम ।     ॐ आदित्याय नम: ।==10000

   8 पुष्य नक्षत्र वेद मंत्र: ===ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद द्युमद्विभाति क्रतमज्जनेषु । यदीदयच्छवस ॠत प्रजात तदस्मासु द्रविणम धेहि चित्रम ।  ॐ बृहस्पतये नम: ।===10000

   9 अश्लेषा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:। ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: ।   ॐ सर्पेभ्यो नम:====10000

  10 मघा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: । प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त:पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।===10000

  11 पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: । भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: । भगाय नम: ।==10000

  12 उत्तराफालगुनी नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत (गुं) रथेन सूर्य्यतव्चा । मध्वायज्ञ (गुं) समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम ।  ॐ अर्यमणे नम: ।==5000

  13 हस्त नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति ।   ॐ सावित्रे नम:===5000

  14  चित्रा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम । द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: । त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।===5000

  15 स्वाती नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर: स्वपत्थ्या निचक्रु: ।ॐ वायव नम: ==5000

  16 विशाखा नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ इन्द्रान्गी आगत (गुं) सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम । अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: ।==10000

  17 अनुराधा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत (गुं) सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश (गुं) सत ।     ॐ मित्राय नम:===10000

  18 ज्येष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ त्रातारभिंद्रमबितारमिंद्र (गुं) हवेसुहव (गुं) शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं पुरुहूतभिंद्र (गुं) स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: ।    ॐ इन्द्राय नम: ।==5000

  19 मूल नक्षत्र वेद मंत्र:===ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि (गुं) स्वयोनावभारुषा तां विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त ।   ॐ निॠतये नम:==5000

  20 पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।==5000

  21 उत्तराषाढ़ा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विश्वे अद्य  मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा: विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।==10000

  22 श्रवण नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा । ॐ विष्णवे नम: ।==10000

  23 धनिष्ठा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम । देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: ।     ॐ वसुभ्यो नम: ।==10000

  24 शतभिषा नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि । ॐ वरुणाय नम: ।==10000

  25 पूर्वभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु ।

ॐ अजैकपदे नम:।==5000

  26 उत्तरभाद्रपद नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि (गुं) सो निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय    ( सुप्रजास्वाय ) । ॐ अहिर्बुधाय नम: । ==1000

  27 रेवती नक्षत्र वेद मंत्र:==ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन । स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम: ।



===10000

नक्षत्र का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता हैं,,,

चन्द्रमा का एक राशिचक्र 27 नक्षत्रों में विभाजित है, इसलिए अपनी कक्षा में चलते हुए चन्द्रमा को प्रत्येक नक्षत्र में से गुजरना होता है। आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होगा, वही आपका जन्म नक्षत्र होगा। आपके वास्तविक जन्म नक्षत्र का निर्धारण होने के बाद आपके बारे में बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। अपने नक्षत्रों की सही गणना व विवेचना से आप अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। इसी प्रकार आप अपने अनेक प्रकार के दोषों व नकारात्मक प्रभावों का विभिन्न उपायों से निवारण भी कर सकते हैं। नक्षत्रों का मिलान रंगों, चिन्हों, देवताओं व राशि-रत्नों के साथ भी किया जा सकता है।

गंडमूल नक्षत्र ,,, अश्विनी, आश्लेषा, मघा, मूला एवं रेवती !ये छ: नक्षत्र गंडमूल नक्षत्र कहे गए हैं !इनमें किसी बालक का जन्म होने पर 27 दिन के पश्चात् जब यह नक्षत्र दोबारा आता है तब इसकी शांति करवाई जाती है ताकि पैदा हुआ बालक माता- पिता आदि के लिए अशुभ न हो ! संस्था में गंडमूल दोष निवारण की विशेष सुविधा उपलब्ध है !

शुभ नक्षत्र ,,, रोहिणी, अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, उत्तरा फाल्गुनी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु, अनुराधा और स्वाति ये नक्षत्र शुभ हैं !इनमें सभी कार्य सिद्ध होते हैं ! 

मध्यम नक्षत्र ,, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठा, आर्द्रा, मूला और शतभिषा ये नक्षत्र मध्यम होते हैं ! इनमें साधारण कार्य सम्पन्न कर सकते हैं, विशेष कार्य नहीं ! 

अशुभ नक्षत्र ,,,,भरणी, कृत्तिका, मघा और आश्लेषा नक्षत्र अशुभ होते हैं !इनमें कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है !ये नक्षत्र क्रूर एवं उग्र प्रकृति के कार्यों के लिए जैसे बिल्डिंग गिराना, कहीं आग लगाना, विस्फोटों का परीक्षण करना आदि के लिए ही शुभ होते हैं ! 



पंचक नक्षत्र ,,,धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती ! ये पाँच नक्षत्र पंचक नक्षत्र कहे गए हैं ! इनमें समस्त शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, यात्रा, गृहारंभ, घर की छत डालना, लकड़ी का संचय करना आदि कार्य नहीं करने चाहियें

नक्षत्र मंत्र : वैदिक , पौराणिक और नक्षत्र देवता मंत्र,,,,हमारे जीवन में नक्षत्रों का भी उतना ही महत्त्व है जितना की नवग्रहों का, ऋषि मुनियों ने नभ मंडल को कल  २७ नक्षत्र में बांटा हैं और प्रतीक राशि के अंतर्गत ३ नक्षत्र आते हैं।

पीड़ा परेशानी होने पर हम ग्रहों की पूजा, दान  और जप तो करते हैं पर नक्षत्रों को भूल जाते हैं। यहाँ आपको नक्षत्रों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवा रहा हूँ जिसमे उनके वैदिक, पौराणिक मंत्र, नक्षत्र देवता के मंत्र और नक्षत्र मंत्र हैं।  अपने नक्षत्र मंत्र के जप करके आप लाभ उठा सकते है उसे बलवान कर सकते हैं साथ ही नक्षत्र की वनस्पति के वृक्ष को लगाकर उसकी सेवा करके यानि नित्य जल देते हुए मंत्र जप कर लाभ ले सकते हैं और यदि किसी कारण से नक्षत्र लाभ न दे रहा हो तो उसे अपने पक्ष में लाभ देने वाला बना सकते हैं।  आपका जन्म नक्षत्र कैसा है और आपके जीवन पर क्या प्रभाव दे रहा है इसके लिए किसी विद्वान पंडित जी या ज्योतिषी से सम्पर्क कर इस जानकारी का लाभ ले सकते हैं।

1) अश्विनी

नक्षत्र: अश्विनी

नक्षत्र देवता : अश्विनीकुमार

नक्षत्र स्वामी : केतु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कुचला

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: घोडा

नक्षत्र तत्व : वायु

नक्षत्र स्वभाव : शुभ

वेद मंत्र

ॐ अश्विनौ तेजसाचक्षु: प्राणेन सरस्वती वीर्य्यम वाचेन्द्रो

बलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम । ॐ अश्विनी कुमाराभ्यो नम: ।

पौराणिक मंत्र:

अश्विनी देवते श्वेतवर्णो तौव्दिभुजौ स्तुमः

lसुधासंपुर्ण कलश कराब्जावश्च वाहनौ ll

नक्षत्र देवता मंत्र:

अ)ॐअश्विनी कुमाराभ्यां नमः

आ) ॐ अश्विभ्यां नमः

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अश्वयुगभ्यां नमःl

2) भरणी

नक्षत्र : भरणी

नक्षत्र देवता : यम - आद्य पितर

नक्षत्र स्वामी :शुक्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : आँवला

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मेष राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : हत्ती

नक्षत्र तत्व : अग्नी

नक्षत्र स्वभाव : क्रूर

वेद मंत्र

ॐ यमायत्वा मखायत्वा सूर्य्यस्यत्वा तपसे देवस्यत्वा सवितामध्वा

नक्तु पृथ्विया स गवं स्पृशस्पाहिअर्चिरसि शोचिरसि तपोसी।

पौराणिक मंत्र:

पाशदण्डं भुजव्दयं यमं महिष वाहनम l

यमं नीलं भजे भीमं सुवर्ण प्रतीमागतम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ यमाय् नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अपभरणीभ्यो नमःl

3) कृतिका

नक्षत्र: कृतिका

नक्षत्र देवता : अग्नी

नक्षत्र स्वामी : रवि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : उंबर, औदुंबर

राशी व्याप्ती : १ले चरण मेष राशीमध्ये,

बाकीचे ३ चरण वृषभ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: बकरी

नक्षत्र तत्व :अग्नी

नक्षत्र स्वभाव : क्रूर

वेद मंत्र

ॐ अयमग्नि सहत्रिणो वाजस्य शांति गवं

वनस्पति: मूर्द्धा कबोरीणाम । ॐ अग्नये नम: ।

पौराणिक मंत्र:

कृतिका देवतामाग्निं मेशवाहनं संस्थितम् l

स्त्रुक् स्तुवाभीतिवरधृक्सप्तहस्तं नमाम्यहम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ आग्नेय नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र :ॐ कृतिकाभ्यो नमः

4) रोहिणी

नक्षत्र: रोहिणी

नक्षत्र देवता :ब्रम्हा

नक्षत्र स्वामी : चंद्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष :जामुन जांभळी, जांभू

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृषभ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: सर्प

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: शुभ

वेद मंत्र

ॐ ब्रहमजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमत: सूरुचोवेन आव: सबुधन्या उपमा

अस्यविष्टा: स्तश्चयोनिम मतश्चविवाह ( सतश्चयोनिमस्तश्चविध: )

पौराणिक मंत्र:

प्रजापतीश्वतुर्बाहुः कमंडल्वक्षसूत्रधृत् l

वराभयकरः शुध्दौ रोहिणी देवतास्तु मे ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:-

अ) ॐ ब्रम्हणे नमःl

आ) ॐ प्रजापतये नमःll

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रौहिण्यै नमःl

5) मृगशिरा

नक्षत्र: मृगशिरा

नक्षत्र देवता: चंद्र

नक्षत्र स्वामी: मंगळ

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : खैर (कात)

राशी व्याप्ती : २ चरण वृषभ राशीमध्ये,

बाकीचे २ चरण मिथुन राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी :सर्प

नक्षत्र तत्व: वायु

नक्षत्र स्वभाव: शुभ

वेद मंत्र

ॐ सोमधेनु गवं सोमाअवन्तुमाशु गवं सोमोवीर: कर्मणयन्ददाति

यदत्यविदध्य गवं सभेयम्पितृ श्रवणयोम । ॐ चन्द्रमसे नम: ।

पौराणिक मंत्र:

श्वेतवर्णाकृतीः सोमो व्दिभुजो वरदण्डभृत् lदशाश्वरथमारूढो मृगशिर्षोस्तु मे मुदे ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र :-

अ) ॐ चंद्रमसे नमःl

आ) ॐ सोमाय नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ मृगशीर्षाय नमःl

6) आर्द्रा

नक्षत्र: आर्द्रा

नक्षत्र देवता : रुद्र (शिव)

नक्षत्र स्वामी : राहु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : कृष्णागरू,काला तेंदू

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मिथुन राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : कुत्रा

नक्षत्र तत्व : जल

नक्षत्र स्वभाव : तीक्ष्ण

वेद मंत्र

ॐ नमस्ते रूद्र मन्यवSउतोत इषवे नम: बाहुभ्यां मुतते नम: ।

ॐ रुद्राय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

रुद्र श्वेतो वृशारूढः श्वेतमाल्यश्चतुर्भुजःl

शूलखड्गाभयवरान्दधानो मे प्रसीदतु ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ रुद्राय नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl

7) पुनर्वसु

नक्षत्र: पुनर्वसु

नक्षत्र देवता: अदिती

नक्षत्र स्वामी: गुरू

नक्षत्र आराध्य वृक्ष :बांस / बांबू

राशी व्याप्ती: 3 चरणे मिथुन राशीमध्ये,

बाकीचे १ चरण कर्क राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: मांजर

नक्षत्र तत्व: वायु

नक्षत्र स्वभाव: चर

वेद मंत्र

ॐ अदितिद्योरदितिरन्तरिक्षमदिति र्माता: स पिता स पुत्र:

विश्वेदेवा अदिति: पंचजना अदितिजातम अदितिर्रजनित्वम ।

ॐ आदित्याय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

अदितीः पीतवर्णाश्च स्त्रुवाक्षकमण्डलून l

दधाना शुभदा मे स्यात पुनर्वसु कृतारव्या

नक्षत्र देवता नाममंत्र :-

अ) ॐ आदित्यै नमःl

आ)ॐ आदितये नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आर्द्रायै नमःl

8) पुष्य

नक्षत्र: पुष्य

नक्षत्र देवता: गुरु

नक्षत्र स्वामी: शनि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: पिंपळ, पीपल

राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी :बकरी

नक्षत्र तत्व :अग्नी

नक्षत्र स्वभाव:शु

वेद मंत्र

ॐ बृहस्पते अतियदर्यौ अर्हाद दुमद्विभाति क्रतमज्जनेषु ।

यददीदयच्छवस ॠतप्रजात तदस्मासु द्रविण धेहि चित्रम ।

ॐ बृहस्पतये नम:

पौराणिक मंत्र:

वंदे बृहस्पतिं पुष्यदेवता मानुशाकृतिम् l

सर्वाभरण संपन्नं देवमंत्रेण मादरात् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ बृहस्पतये नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुष्याय नमःl

9) आश्लेषा

नक्षत्र:आश्लेषा

नक्षत्र देवता: सर्प

नक्षत्र स्वामी : बुध

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: नागकेसर

राशी व्याप्ती :४ हि चरण कर्क राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : मांजर

नक्षत्र तत्व : जल

नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण,शोक

वेद मंत्र

ॐ नमोSस्तु सर्पेभ्योये के च पृथ्विमनु:।

ये अन्तरिक्षे यो देवितेभ्य: सर्पेभ्यो नम: ।

ॐ सर्पेभ्यो नम:।

पौराणिक मंत्र:

सर्पोरक्त स्त्रिनेत्रश्च फलकासिकरद्वयःl

आश्लेषा देवता पितांबरधृग्वरदो स्तुमे ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ सर्पेभ्यो नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ आश्लेषायै नमःl

10) मघा

नक्षत्र: मघा

नक्षत्र देवता: पितर

नक्षत्र स्वामी: केतु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: बरगद

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: उंदीर

नक्षत्र तत्व: अग्नी

नक्षत्र स्वभाव :क्रुर, उग्र

वेद मंत्र

ॐ पितृभ्य: स्वधायिभ्य स्वाधानम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानम: ।

प्रपितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम: अक्षन्न पितरोSमीमदन्त:

पितरोतितृपन्त पितर:शुन्धव्म । ॐ पितरेभ्ये नम: ।

पौराणिक मंत्र :

पितरः पिण्डह्स्ताश्च कृशाधूम्रा पवित्रिणःl

कुशलं द्घुरस्माकं मघा नक्षत्र देवताःll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पितृभ्यो नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मघायै नमः

11)पुर्वा (फाल्गुनी)

नक्षत्र: पुर्वा (फाल्गुनी)

नक्षत्र देवता : भग

नक्षत्र स्वामी : शुक्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : पलाश (पळस)

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण सिंह राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी:उंदीर

नक्षत्र तत्व: क्रुर

नक्षत्र स्वभाव : शुभ

वेद मंत्र

ॐ भगप्रणेतर्भगसत्यराधो भगे मां धियमुदवाददन्न: ।

भगप्रजाननाय गोभिरश्वैर्भगप्रणेतृभिर्नुवन्त: स्याम: ।

ॐ भगाय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

भगं रथवरारुढं व्दिभुंज शंखचक्रकम् l

फाल्गुनीदेवतां ध्यायेत् भक्ताभीष्टवरप्रदाम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ भगाय नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्व फाल्गुनीभ्यां नमःl



12) उत्तरा (फाल्गुनी)

नक्षत्र:उत्तरा (फाल्गुनी)

नक्षत्र देवता : अर्यमा

नक्षत्र स्वामी: रवि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष पाकड़

राशी व्याप्ती १ ले चरण सिंह राशीमध्ये,

बाकीचे ३ चरण कन्या राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: गाय

नक्षत्र तत्व :वायु

नक्षत्र स्वभाव: शुभ

वेद मंत्र

ॐ दैव्या वद्धर्व्यू च आगत गवं रथेन सूर्य्यतव्चा ।

मध्वायज्ञ गवं समञ्जायतं प्रत्नया यं वेनश्चित्रं देवानाम ।

ॐ अर्यमणे नम: ।

पौराणिक मंत्र:

संपूजयाम्यर्यमणं फाल्गुनी तार देवताम् l

धुम्रवर्णं रथारुढं सुशक्तिकरसंयुतम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ अर्यम्ने नमः

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरा फाल्गुनीभ्यां नमःl

13) हस्त

नक्षत्र :हस्त

नक्षत्र देवता : सुर्य

नक्षत्र स्वामी : चंद्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : ,चमेली रीठा

राशी व्याप्ती :४ हि चरण कन्या राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : म्हैस

नक्षत्र तत्व : वायु

नक्षत्र स्वभाव: शुभ, सत्वगुणी

वेद मंत्र

ॐ विभ्राडवृहन्पिवतु सोम्यं मध्वार्य्युदधज्ञ पत्त व विहुतम

वातजूतोयो अभि रक्षतित्मना प्रजा पुपोष: पुरुधाविराजति ।

ॐ सावित्रे नम: ।

पौराणिक मंत्र:

सवितारहं वंदे सप्ताश्चरथ वाहनम् l

पद्मासनस्थं छायेशं हस्तनक्षत्रदेवताम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र :- ॐ सवित्रे नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ हस्ताय नमः

14) चित्रा

नक्षत्र : चित्रा

नक्षत्र देवता: त्वष्टा

नक्षत्र स्वामी: मंगळ

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: बेल

राशी व्याप्ती : २ चरण कन्या राशीमध्ये,

बाकीचे, २ चरण तुळ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: वाघ

नक्षत्र तत्व : वायु

नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण

वेद मंत्र

ॐ त्वष्टातुरीयो अद्धुत इन्द्रागी पुष्टिवर्द्धनम ।

द्विपदापदाया: च्छ्न्द इन्द्रियमुक्षा गौत्र वयोदधु: ।

त्वष्द्रेनम: । ॐ विश्वकर्मणे नम: ।

पौराणिक मंत्र:

त्वष्टारं रथमारूढं चित्रानक्षत्रदेवताम् l

शंखचक्रान्वितकरं किरीटीनमहं भजे ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ त्वष्ट्रे नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ चित्रायै नमःl

15) स्वाती

नक्षत्र :स्वाती

नक्षत्र देवता: वायु

नक्षत्र स्वामी : राहु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: अर्जुन

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण तुळ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: म्हैस

नक्षत्र तत्व: अग्नी

नक्षत्र स्वभाव: शुभ

वेद मंत्र

ॐ वायरन्नरदि बुध: सुमेध श्वेत सिशिक्तिनो

युतामभि श्री तं वायवे सुमनसा वितस्थुर्विश्वेनर:

स्वपत्थ्या निचक्रु: । ॐ वायव नम: ।

पौराणिक मंत्र

वायुवरं मृगारुढं स्वाती नक्षत्र देवताम् l

खड्.ग चर्मोज्वल करं धुम्रवर्ण नमाम्यह्म् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वायवे नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ स्वात्यै नमःl

16) विशाखा

नक्षत्रः विशाखा

नक्षत्र देवता : इंद्राग्नी

नक्षत्र स्वामी : गुरू

नक्षत्र आराध्य वृक्ष:  कटाई, नागकेशर

राशी व्याप्ती : पहिले 3 चरण तुळ राशीमध्ये,

बाकीचे १ चरण वृश्चिक राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : वाघ

नक्षत्र तत्व : वायु

नक्षत्र स्वभाव: अशुभ

वेद मंत्र

ॐ इन्द्रान्गी आगत गवं सुतं गार्भिर्नमो वरेण्यम ।

अस्य पात घियोषिता । ॐ इन्द्रान्गीभ्यां नम: ।

पौराणिक मंत्र:

इंद्राग्नीशुभदौ स्यातां विशाखा देवतेशुभे l

नमोम्ये करथारुढौ वराभयकरांबुजौ l

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राग्नीभ्यां नमः

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ विशाखाभ्यां नमःl

17) अनुराधा

नक्षत्र :अनुराधा

नक्षत्र देवता : मित्र

नक्षत्र स्वामी : शनि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष :मौलश्री

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: हरीण

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: शुभ

वेद मंत्र

ॐ नमो मित्रस्यवरुणस्य चक्षसे महो देवाय तदृत

गवं सपर्यत दूरंदृशे देव जाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्योयश

गवं सत । ॐ मित्राय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

मित्रं पद्मासनारूढं अनुराधेश्वरं भजे l

शूलां कुशलसद्भाहुं युग्मंशोणितवर्णकम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ मित्राय नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ अनुराधाभ्यो नमःl

18) जेष्ठा

नक्षत्र: जेष्ठा

नक्षत्र देवता: इंद्र

नक्षत्र स्वामी :बुध

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: निर्गुडी/चीड़

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण वृश्चिक राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: हरीण

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण

वेद मंत्र

ॐ त्राताभिंद्रमबितारमिंद्र गवं हवेसुहव गवं शूरमिंद्रम वहयामि शक्रं

पुरुहूतभिंद्र गवं स्वास्ति नो मधवा धात्विन्द्र: । ॐ इन्द्राय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

श्वेतहस्तिनमारूढं वज्रांकुशलरत्करम् l

सहस्त्रनेत्रं पीताभं इंद्रं ह्रदि विभावये ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ इंद्राय नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ जेष्ठायै नमःl

19) मूळ

नक्षत्र:मूळ

नक्षत्र देवता: निॠति (राक्षस)

नक्षत्र स्वामी: केतु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष : साल

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: कुत्रा

नक्षत्र तत्व : जल

नक्षत्र स्वभाव: तीक्ष्ण

वेद मंत्र

ॐ मातेवपुत्रम पृथिवी पुरीष्यमग्नि गवं स्वयोनावभारुषा तां

विश्वेदैवॠतुभि: संविदान: प्रजापति विश्वकर्मा विमुञ्च्त ।

ॐ निॠतये नम: ।

पौराणिक मंत्र: खड्.गखेटधरं कृष्णं यातुधानं नृवाहनम् l

अर्ध्वकेशं विरुपाक्षं भजे मुलाधिदेवताम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ निॠतये नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ मुलाय नमःl

20) पूर्वाषाढा

नक्षत्र: पूर्वाषाढा

नक्षत्र देवता: जल/ उदक

नक्षत्र स्वामी: शुक्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: वेत

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण धनु राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी:वानर

नक्षत्र तत्व: जल

नक्षत्र स्वभाव: उग्र

वेद मंत्र

ॐ अपाघ मम कील्वषम पकृल्यामपोरप: अपामार्गत्वमस्मद

यदु: स्वपन्य-सुव: । ॐ अदुभ्यो नम: ।

पौराणिक मंत्र:

आषाढदेवता नित्यमापः सन्तु शुभावहाःl

समुद्र गास्तरा गिणोल्हादिन्यःसर्वदेहिनाम्ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अद्भयो नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पूर्वाषाढाभ्यां नमःl

21) उत्तराषाढा

नक्षत्र: उत्तराषाढा

नक्षत्र देवता: विश्वदेव

नक्षत्र स्वामी: रवि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष :फणस, कटहल

राशी व्याप्ती : पहिले चरण धनु राशीमध्ये,

बाकीचे ३ चरण मकर राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: मुंगुस

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: स्थिर

वेद मंत्र

ॐ विश्वे अद्य मरुत विश्वSउतो विश्वे भवत्यग्नय: समिद्धा:

विश्वेनोदेवा अवसागमन्तु विश्वेमस्तु द्रविणं बाजो अस्मै ।

पौराणिक मंत्र:

विश्वांदेवान् अहं वंदेषाढनक्षत्रदेवताम् l

श्रीपुष्टिकीर्तीधीदात्री सर्वपापानुमुक्तये ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तराषाढाभ्यां नमःl

22) श्रवण

नक्षत्र: श्रवण

नक्षत्र देवता: विष्णु

नक्षत्र स्वामी: चंद्र

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: रुई ( अर्क ) मंदार

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण मकर राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: वानर

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: चर

वेद मंत्र

ॐ विष्णोरराटमसि विष्णो श्नपत्रेस्थो विष्णो स्युरसिविष्णो

धुर्वोसि वैष्णवमसि विष्नवेत्वा । ॐ विष्णवे नम: ।

पौराणिक मंत्र:

शांताकारं चतुर्हस्तं श्रोणा नक्षत्रवल्लभम् l

विष्णु कमलपत्राक्षं ध्यायेद् गरुड वाहन् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ विष्णवे नमः l

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ श्रवणाय नमःl23) धनिष्ठा

नक्षत्र: धनिष्ठा

नक्षत्र देवता :वसु

नक्षत्र स्वामी: मंगळ

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: शमी

राशी व्याप्ती: पहिले २ चरण मकर राशीमध्ये,

बाकीचे २ चरण कुंभ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: सिंह

नक्षत्र तत्व: पृथ्वी

नक्षत्र स्वभाव: थोडेसे शुभ

वेद मंत्र

ॐ वसो:पवित्रमसि शतधारंवसो: पवित्रमसि सहत्रधारम ।

देवस्त्वासविता पुनातुवसो: पवित्रेणशतधारेण सुप्वाकामधुक्ष: ।

ॐ वसुभ्यो नम: ।

पौराणिक मंत्र

श्राविष्ठादेवतां वंदे वसुन्वरधराश्रिताम् l

शंखचक्रांकितरांकिरीटांकित मस्तकाम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वसुभ्यो नमः

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ धनिष्ठायै नमःl

24) शतभिषा

नक्षत्र: शतभिषा

नक्षत्र देवता: वरुण

नक्षत्र स्वामी: राहु

नक्षत्र आराध्य वृक्ष :कदंब

राशी व्याप्ती : ४ हि चरण कुंभ राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: घोडा

नक्षत्र तत्व: जल

नक्षत्र स्वभाव: चर

वेद मंत्र

ॐ वरुणस्योत्त्मभनमसिवरुणस्यस्कुं मसर्जनी स्थो वरुणस्य

ॠतसदन्य सि वरुण स्यॠतमदन ससि वरुणस्यॠतसदनमसि ।

ॐ वरुणाय नम: ।

पौराणिक मंत्र:

वरुणं सततं वंदे सुधाकलश धारीणम् l

पाशहस्तं शतभिशग् देवतां देववंदीतम ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ वरुणाय नमः

नक्षत्र नाम मंत्र :- ॐ शतभिषजे नमः

25) पुर्वाभाद्रपदा

नक्षत्र: पुर्वाभाद्रपदा

नक्षत्र देवता: अजैक चरण

नक्षत्र स्वामी: गुरू

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: आंबा, आम

राशी व्याप्ती : पहिले ३ चरण कुंभ राशीमध्ये,

बाकीचे १ चरण मीन राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी :सिंह

नक्षत्र तत्व: अग्नी

नक्षत्र स्वभाव: उग्र

वेद मंत्र

ॐ उतनाहिर्वुधन्य: श्रृणोत्वज एकपापृथिवी समुद्र: विश्वेदेवा

ॠता वृधो हुवाना स्तुतामंत्रा कविशस्ता अवन्तु ।

ॐ अजैकपदे नम:।

पौराणिक मंत्र:

शिरसा महजं वंदे ध्येकपादं तमोपहम् l

मुदे प्रोष्ठपदेवानं सर्वदेवनमस्कृतम् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र :-

ॐ अजैकपदे नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ पुर्वाप्रोष्ठपद्भ्यां नमःl

26) उत्तराभाद्रपदा

नक्षत्र : उत्तराभाद्रपदा

नक्षत्र देवता : अहिर्बुंधन्य

नक्षत्र स्वामी: शनि

नक्षत्र आराध्य वृक्ष:नीम

राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी: गायक

नक्षत्र तत्व : जल

नक्षत्र स्वभाव : ध्रुव

वेद मंत्र

ॐ शिवोनामासिस्वधितिस्तो पिता नमस्तेSस्तुमामाहि गवं सो

निर्वत्तयाम्यायुषेSत्राद्याय प्रजननायर रायपोषाय ( सुप्रजास्वाय ) ।

पौराणिक मंत्र:

अहिर्मे बुध्नियो भूयात मुदे प्रोष्ठ पदेश्वरःl

शंखचक्रांकीतकरः किरीटोज्वलमौलिमान् ll

नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ अहिर्बुंधन्याय नमःl

नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ उत्तरप्रोष्ठपदभ्यां नमःl

27) रेवती

नक्षत्र : रेवती

नक्षत्र देवता :पूषा

नक्षत्र स्वामी :बुध

नक्षत्र आराध्य वृक्ष: महुआ

राशी व्याप्ती : ४ ही चरण मीन राशीमध्ये

नक्षत्र प्राणी : हत्ती

नक्षत्र तत्व: जल

नक्षत्र स्वभाव: मृदु

वेद मंत्र

ॐ पूषन तव व्रते वय नरिषेभ्य कदाचन ।
स्तोतारस्तेइहस्मसि । ॐ पूषणे नम:
पौराणिक मंत्र:
पूषणं सततं वंदे रेवतीशं समृध्दये l
वराभयोज्वलकरं रत्नसिंहासने स्थितम् ll
नक्षत्र देवता नाममंत्र:- ॐ पूष्णे नमः
नक्षत्र नाम मंत्र:- ॐ रेवत्यै नमःl
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Thursday, 5 May 2016

धनिष्ठा नक्षत्र

धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरणों में जन्मा जातक गू, गे नाम से जाना जा सकता है। मंगल इस नक्षत्र का स्वामी है, वहीं राशि स्वामी शनि है। मंगल का नक्षत्र होने से ऐसे जातक ऊर्जावान, तेजस्वी, पराक्रमी, परिश्रम के द्वारा सफलता पाने वाला होता है। कुंम राशि में जन्मा होने से ऐसे जातक स्थिर स्वभाव के होते हैं।
मेष लग्न में सशस्त्र स्वामी मंगल लग्न में गुरु भाग्येश की युति में हो तो ऐसे जातक स्वप्रयत्नों से सफलता पाते हैं। मंगल भाव में हो तो ऐसे जातक का भाग्य साथ देने वाला होता है। मंगल पंचम में भी शुभ फलदायी रहता है।
वृषभ लग्न में मंगल नवम भाव में हो तो ऐसे जातक ऊर्जावान, शक्तिशाली, बाहर से लाभ पाने वाला सुखी संपन्न होता है। नक्षत्र स्वामी मंगल का सूर्य या गुरु के साथ हो तो ऐसे जातक धन संपन्न होते हैं।
मिथुन लग्न में नक्षत्र स्वामी मंगल दशम में हो तो कर्मानुसार आय का लाभ मिलता है। सप्तम में हो तो पत्नी, तृतीय हो तो साझेदारी, भाई, मित्र से लाभ मिलता है।
धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरणों में जन्मा जातक गू, गे नाम से जाना जा सकता है। मंगल इस नक्षत्र का स्वामी है, वहीं राशि स्वामी शनि है। मंगल का नक्षत्र होने से ऐसे जातक ऊर्जावान, तेजस्वी, पराक्रमी, परिश्रम के द्वारा सफलता पाने वाला होता है।
कर्क लग्न में मंगल दशम में हो तो पिता, राज्य, व्यापार से भाग्योदय होता है। माता-भूमि भवन से लाभ, नवम में हो तो भाग्य बलशाली होता है। षष्ठ में हो तो शत्रु न होकर भाग्यशाली, गुस्सैला भी हो सकता है। तृतीय एकादश में भी शुक्र फलदायी होगा।
सिंह लग्न में नक्षत्र स्वामी मंगल भाग्य नवम भाव में हो तो ऐसा जातक भाग्यशाली होता है, वहीं चतुर्थ भाव में हो तो ऐसे जातक को भूमि-भवन, माता एवं जनता से संबंधित कार्यों में लाभ मिलता है। लग्न में हो तो प्रभावशाली होकर भाग्य निरंतर साथ देता है। पंचम में हो तो संतान उत्तम होती है।
कन्या लग्न में नक्षत्र स्वामी मंगल चतुर्थ में हो तो भाइयों के सहयोग से लाभ मिलकर भूमि भवन का लाभ भी मिलता है। पंचम में हो तो स्वप्रयत्नों से विद्या लाभ मिलेगा। पत्नी गुस्सैली होगी। द्वादश में हो तो पराक्रम द्वारा विदेश या बाहर से लाभ मिलता है।

तुला लग्न में मंगल तृतीय में चतुर्थ में सप्तम में ठीक फल देगा। शनि की स्थिति उत्तम रही तो शुभ परिणाम में वृद्धि होगी। यदि शनि-मंगल साथ हो या दृष्टि संबंध रखते हो तो अशुभ फल अधिक मिलते हैं।
वृश्चिक लग्न में नक्षत्र स्वामी दशम हो तो व्यापार, प्रशासनिक, सेना, राजनीति से लाभ मिलता है। लग्न में हो तो साहसी, मेहनती, स्वप्रयत्नों से लाभ पाने वाला होता है। पंचम में हो तो विद्या, संतान, उत्तम हो, तृतीय में हो तो भाईयों व मित्रों से लाभ मिलता है।
धनु लग्न में नक्षत्र स्वामी मंगल नवम में भाग्य में संतान, विद्या उत्तम होती है। पंचम में हो तो आयु में कष्ट रहता है। बाहर से लाभ होता है। द्वितिय भाव में हो तो विद्या, कुटुंब, संतान आदि से लाभ पाए। शनि उच्च स्वराशि का हो तो उत्तम लाभ मिलता है।
मकर लग्न में नक्षत्र स्वामी मंगल लग्न में, चतुर्थ में, एकादश में उत्तम लाभ मिलता है। ऐसा जातक राजनीति, पुलिस प्रशासन, खलनायक की भूमिका से भी लाभ पाने वाला होता है।
कुंभ लग्न में सप्तम में हो तो ससुराल एवं पत्नी से लाभ मिलता है। दशम में पिता, द्वादश में बाहर से तृतीय में स्व भुजबल से लाभ मिलेगा।
मीन लग्न में लग्न में हो तो स्वप्रयत्नों से धन, कुटुंब का लाभ मिले, भाग्य साथ देगा। दशम में पिता से, कर्म से लाभ, राजनीति में सफलता नवम में हो तो भाग्यशाली होगा। किसी भी लग्न में मंगल शनि से दृष्टि संबंध न रखने पर ही उत्तम फल मिलते हैं।

उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में हुआ है

उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में हुआ है तो आप स्वभाव से एक दयालु व्यक्ति हैं. आप धार्मिक होने के साथ साथ वैरागी भी हैं. आप समाज में एक धार्मिक नेता , प्रसिद्द शास्त्र विद एवं मानव प्रेमी के रूप में प्रख्यात हैं. आप कोमल हृदयी हैं एवं दूसरों के साथ सदैव सद्भावना रखते हैं. यदि आपके साथ कोई दुर्व्यवहार भी करता है तो आप उसे क्षमा कर देते हैं. आप अपने दिल में भी किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं रखते. आप महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं हैं परन्तु इच्छाएं बढ़ी-चढ़ी होती हैं व् मन ही मन आप उन्नत्ति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाते हैं. देश भक्ति एवं इमानदारी आपके प्रमुख गुण हैं. आप मनमौजी परन्तु मजबूत विचारों वाले व्यक्ति हैं.
आप उन गिने चुने व्यक्तियों में से हैं जिन्हें आम लोग आदर की दृष्टि से देखते हैं. उत्तराभाद्रपद जातक निष्पक्ष व्यक्तित्व के स्वामी होते हैं . आप किसी को भी उसकी आर्थिक व् सामाजिक सम्पन्नता के आधार पर नहीं अपितु मानवता के आधार पर तौलते है. आप बहुत बुद्धिमान एवं विवेकशील व्यक्ति है. एक प्रखर वक्ता होने के कारण अनायास ही लोग आपकी और खिचाव महसूस करते हैं. आपकी सबसे बड़ी कमी आपका क्रोध है जो किसी भी छोटी से छोटी बात पर आ जाता है. आप विपरीत लिंगियों के प्रति विशेष आकर्षण महसूस करते हैं और उनका साथ आपको बेहद प्रिय है.
उत्तराभाद्रपद जातक किसी भी कार्यक्षेत्र में उच्च पद को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं. आप अपनी शैक्षिक योग्यता के आधार पर नहीं अपितु अपने गुणों के कारण सफल होते हैं. आप अक्सर अपने से अधिक शिक्षित लोगों से भी अधिक सफलता पाते हैं. आप कठोर परिश्रमी एवं कार्य के प्रति बहुत अधिक समर्पित व्यक्ति हैं जो कभी भी किसी कार्य को बीच में छोड़ना पसंद नहीं करते. आप अपने करियर में बहुत मान सम्मान और प्रशंसा पाते हैं. आप अधिक समय तक निचले पदों पर कार्यरत नहीं रहते हैं अपनी लग्न और मेहनत के कारण आपकी उच्च पदों के लिए तरक्की शीघ्र ही हो जाती है.
आप अपने जीवन के 18वें या 19 वें वर्ष से ही जीवन यापन में लग जाते हैं. जीवन के 19, 21, 28., 30, 35 और 42वां वर्ष आपके करियर में महतवपूर्ण बदलाव लायेगा.
उत्तराभाद्रपद जातक का बचपन कठिनाईयों में बीतता है. आपको अपने माता पिता से अपेक्षित स्नेह नहीं प्राप्त होता है, हालाँकि पिता के कारण आप समाज में गौरवान्वित होते हैं परन्तु पिता से आपको अपने जीवन में किसी भी प्रकार का कोई लाभ प्राप्त नहीं होता है और सदा ही अपने जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है. आपका विवाह एक सुंदर और आज्ञाकारी स्त्री से होता है , इस कारण आपका दाम्पत्य जीवन बहुत सुखी एवं समृद्ध होता है. आपकी आज्ञाकारी संतान आपकी प्रसन्नता का कारण बनती है.
उत्तराभाद्रपद में जन्मी जातिका बुद्धिमान और धर्म के प्रति रूचि रखने वाली होती हैं. आप धैर्यवान एवं गुणवान होती हैं. आप जीवन में सदा मान सम्मान एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करती हैं.
स्वभाव संकेत: उत्तराभाद्रपद जातकों का प्रमुख लक्षण है बातूनी होना 
रोग संभावना: पैरों से सम्बंधित रोग या चोट, हर्निया, बवासीर
विशेषताएं ==प्रथम चरण : इस चरण का स्वामी सूर्य हैं. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्मा जातक राजा के समान पराक्रमी होता है, लग्न स्वामी शनि व् चरण स्वामी स्वामी सूर्य में परस्पर शत्रुता है. अतः सूर्य की दशा अशुभ फल देगी. शनि की दशा भी प्रतिकूल फल देगी. शनि में सूर्य या सूर्य में शनि की अन्तर्दशा मारक दशा का फल देगी. गुरु की दशा उत्तम , स्वस्थ्य प्रद एवं राजयोग देने वाली होगी.
द्वितीय चरण : इस चरण का स्वामी बुध हैं. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दूसरेचरण में जन्मा जातक तस्करी में रूचि रखता है. लग्न नक्षत्र स्वामी शनि बुध का मित्र है. अतः शनि की दशा माध्यम ,परन्तु बुध की दशा अति शुभ फल देगी. बुध की दशा में गृहस्थ सुख एवं भौतिक उपलब्धियां प्राप्त होंगी. गुरु की दशा भी जातक को उत्तम फल देगी.
तृतीय चरण : इस चरण का स्वामी शुक्र हैं. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के तीसरे चरण में जन्मा जातक पुत्रवान होता है, तीसरे चरण का स्वामी शुक्र है जो नक्षत्र स्वामी का मित्र है. अतः शनि की दशा माध्यम परन्तु शुक्र की दशा शुभ फल देगी. शुक्र की दशा में पराक्रम बढेगा . लग्नेश गुरु की दशा अति उत्तम फल देगी.
चतुर्थ चरण : इस चरण का स्वामी मंगल हैं. उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के चौथे चरण में जन्मा जातक संपूर्ण सुखी होता है, लग्नेश गुरु की शनि से शत्रुता है तथा लग्न नक्षत्र स्वामी शनि की नक्षत्र चरण स्वामी मंगल से शत्रुता है. अतः शनि की दशा अशुभ फल देगी एवं मंगल की दशा मध्यम फल देगी. जो लाभ मंगल की दशा में जातक को मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पायेगा. गुरु की दशा राजयोग प्रदाता है.

रेवती नक्षत्र==आकाश मंडल में अंतिम नक्षत्र है। ,, 1== 12 ==लग्न

रेवती नक्षत्र==आकाश मंडल में अंतिम नक्षत्र है।  ,, 1== 12 ==लग्न
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रेवती नक्षत्र==आकाश मंडल में अंतिम नक्षत्र है। यह मीन राशि में आता है। इसे दे, दो, चा, ची के नाम से जाना जाता है। रेवती नक्षत्र का स्वामी बुध है। बुध बुद्धि का कारक होने के साथ इसे वणिक ग्रह माना गया है। राशि स्वामी गुरु है। गुरु बुध की युति जिस भाव में होगी वैसा फल देगा। बुध-गुरु की युति वाला जातक विवेकवान, वणिक, सफल अधिवक्ता, व्यापारी भी होता है।
1==मेष लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध, तृतीय हो व गुरु नवम पंचम, लग्नमें हो तो ऐसे जातक स्वयं भाग्य के निर्माता होते हैं। ऐसे जातक धर्म-कर्म को मानने वाले, उत्तम वक्ता व मित्रों से लाभ पाने वाले होते हैं।
2==वृषभ लग्न में बुध, द्वितीय, पंचम, नवम, चतुर्थ में हो व गुरु एकादश, तृतीय, चतुर्थ, सप्तम में हो तो शुभ फलदायी होकर उस जातक को विद्वान संतान से प्रसिद्धि दिलाता है। स्वयं भी प्रतिभाशाली होता है।
3==मिथुन लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध लग्न, चतुर्थ, तृतीय, नवम में गुरु तृतीय, षष्ठ, एकादश, सप्तम, दशम भाव में हो तो ऐसा जातक पत्नी, राज्य, पराक्रम से उन्नति पाता है। ऐसा जातक राजनीतिक भी होता है।
4===कर्क लग्न में बुध, द्वादश, तृतीय, द्वितीय, दशम में गुरु लग्न, पंचम, नवम, दशम में हो तो ऐसा जातक भाग्यवान, प्रभावशील, विद्या, संतान से लाभ पाने वाला विदेशों से लाभ पाने वाला भाइयों से सुखी रहता है।
5==सिंह लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध एकादश भाव में हो तो ऐसा जातक धन-धान्य से पूर्ण होता हैं। लग्न, द्वितीय भाव में शुभ फलदायी रहेगा। राशि स्वामी गुरु लग्न, पंचम, नवम, चतुर्थ, द्वादश में हो तो ऐसा जातक भाग्यशाली, विद्वान, प्रभावशील सुख-संपन्न वाला होगा।
6===कन्या लग्न में बुध लग्न में हो तो प्रभावी राजनेता या सफल व्यापारी होगा। दशम में पिता से लाभ पिता के कारोबार से लाभ होगा। द्वादश में हो तो विदेश से या जन्म स्थान से दूर लाभ मिलेगा। राशि स्वामी चतुर्थ, सप्तम, तृतीय, द्वादश, एकादश में हो तो अतिशुभफल मिलेंगे।
7===तुला लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध नवम में भाग्यशाली, द्वादश में बाहर से लाभ व एकादश में हो तो शुभफल देगा। चतुर्थ में भूमि-भवन से लाभ देगा। गुरु द्वितीय, तृतीय, दशम, एकादश में ठीक रहेगा। 
8==वृश्चिक लग्न में बुध, एकादश, दशम, तृतीय चतुर्थ में उत्तम फल देगा, वहीं गुरु लग्न, पंचम, नवम, दशम द्वितीय में हो तो ऐसी स्थिति वाला जातक धनधान्य, भाग्य, राज्य, पिता, विद्या संतान आदि सुख से संपन्न होगा।
9==धनु लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध दशम, सप्तम, नवम, द्वितीय भाव में अतिशुभ फलदायी होकर, पिता, नौकरी, राज्य, पत्नी, भाग्य, कुटुंब से लाभदायी होगा। राशि स्वामी गुरु लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम, द्वादश में शुभफलदायी रहेगा।
10==मकर लग्न में बुध नवम में भाग्यशाली लग्न में उत्तम फलदायी एकादश में भाग्य से लाभ दिलाएगा। वहीं राशि स्वामी गुरु, तृतीय, सप्तम एकादश, द्वादश में हो तो शुभफलदायी रहेगा।
11==कुंभ लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध, लग्न, सप्तम, पंचम, द्वादश, दशम में शुभ परिणाम देगा। वहीं गुरु, द्वितीय, षष्ठ, सप्तम, दशम, एकादश में हो तो उत्तम लाभकारी रहेगा। ऐसा जातक विदेश से विद्या, राज्य व्यापार से उन्नति पाएगा। 
12==मीन लग्न में नक्षत्र स्वामी बुध चतुर्थ, सप्तम, एकादश में उत्तम लाभदायक रहेगा। वहीं राशि स्वामी गुरु लग्न, पंचम, नवम, दशम में अनुकूल रहेगा। ऐसी स्थिति वाला जातक धर्म, धर्मपरायण, जनता, भूमि, भवन, माता, पत्नी, विद्या के बल से, संतान, भाग्यबल द्वारा लाभान्वित होगा। बुध की महादशा या गुरु की अंतरदशा में शुभ फल देगा।

Monday, 2 May 2016

नवग्रह ध्यानम्॥ श्री नवग्रह स्तोत्र,,नवग्रह देवता पूजन

नवग्रह ध्यानम्॥ श्री नवग्रह स्तोत्र,,नवग्रह देवता पूजन
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अथ सूर्यस्य ध्यानं - त्रिपुरासर्वस्वे प्रत्यक्षदेवं विशदं सहस्रमरीचिभिः शोभितभूमिदेशम्। सप्ताश्वगं सद्ध्वजहस्तमाद्यं देवं भजेऽहं मिहिरं हृदब्‍जे॥
अथ चन्द्रस्य ध्यानं - निःसृतमागमे शङ्खप्रभमेणप्रियं शशाङ्कमीशानमौलिस्थितमीड्यवृत्तम्। तमीपतिं नीरजयुग्महस्तं ध्याये हृदब्‍जे शशिनं ग्रहेशम्॥
अथ भौमस्य ध्यानं - आगमामृतमञ्‍जर्याम् प्रतप्तगाङ्गेयनिभं ग्रहेशं सिंहासनस्थं कमलासिहस्तम्। सुरासुरैः पूजितपादपद्मं भौमं दयालुं हृदये स्मरामि॥
अथ सौम्यस्य ध्यानं - भैरवतन्‍त्रे सोमात्मजं हंसगतं द्विबाहुं शङ्खेन्दुरूपं ह्यसिपाशहस्तम्। दयानिधिं भूषणभूषिताङ्गं बुधं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम्॥
अथ जीवस्य ध्यानं - भैरवतन्‍त्रे तेजोमयं शक्तित्रिशूलहस्तं सुरेन्द्रज्येष्ठैः स्तुतपादपद्मम्। मेधानिधिं हस्तिगतं द्विबाहुं गुरुं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम्॥
अथ शुक्रस्य ध्यानं - कुब्‍जिकासर्वस्वे सन्तप्तकाञ्‍चननिभं द्विभुजं दयालुं पीताम्बरं धृतसरोरुहद्वन्द्वशूलम्। क्रौञ्‍चासनं ह्यसुरसेवितपादपद्मं शुक्रं स्मरे द्विनयनं हृदि पङ्कजेऽहम्॥
अथ शनेर्ध्यानं - शुभदमागमामृते नीलाञ्‍जनाभं मिहिरेष्टपुत्रं ग्रहेश्वरं पाशभुजङ्गपाणिम्। सुरासुराणां भयदं द्विबाहुं शनिं स्मरे मानसपङ्कजेऽहम्॥
अथ सैंहिकेयस्य ध्यानं - वामकेश्वर तन्‍त्रे शीतांशुमित्रान्तकमीड्यरूपं घोरं च वैडुर्यनिभं विबाहुम्। त्रैलोक्यरक्षाप्रदंमिष्टदं च राहुं ग्रहेन्द्रं हृदये स्मरामि॥
अथ केतोश्च ध्यानं - तन्‍त्रसागरे लाङ्गुलयुक्तं भयदं जनानां कृष्णाम्बुभृत्सन्निभमेकवीरम्। कृष्णाम्बरं शक्तित्रिशूलहस्तं केतुं भजे मानसपङ्कजेऽहम्॥
॥ इति नवग्रहध्यानं सम्पूर्णम्॥
॥ नवग्रहमन्त्रः॥
श्रीगणेशाय नमः।
अथ सूर्यस्य मन्त्रः - विश्वनाथसारोद्धारे ॐ ह्सौः श्रीं आं ग्रहाधिराजाय आदित्याय स्वाहा॥
अथ चन्द्रस्य मन्त्रः - कालीपटले ॐ श्रीं क्रीं ह्रां चं चन्द्राय नमः॥
अथ भौमस्य मन्त्रः - शारदाटीकायाम् ऐं ह्सौः श्रीं द्रां कं ग्रहाधिपतये भौमाय स्वाहा॥
अथ बुधस्य मन्त्रः - स्वतन्त्रे ॐ ह्रां क्रीं टं ग्रहनाथाय बुधाय स्वाहा॥
अथ जीवस्य मन्त्रः - त्रिपुरातिलके ॐ ह्रीं श्रीं ख्रीं ऐं ग्लौं ग्रहाधिपतये बृहस्पतये ब्रींठः ऐंठः श्रींठः स्वाहा॥
अथ शुक्रस्य मन्त्रः - आगमशिरोमणौ ॐ ऐं जं गं ग्रहेश्वराय शुक्राय नमः॥
अथ शनैश्चरस्य मन्त्रः - आगमलहर्याम् ॐ ह्रीं श्रीं ग्रहचक्रवर्तिने शनैश्चराय क्लीं ऐंसः स्वाहा॥
अथ राहोर्मन्त्रः - आगमलहर्याम् ॐ क्रीं क्रीं हूँ हूँ टं टङ्कधारिणे राहवे रं ह्रीं श्रीं भैं स्वाहा॥
अथ केतु मन्त्रः - मन्त्रमुक्तावल्याम् ॐ ह्रीं क्रूं क्रूररूपिणे केतवे ऐं सौः स्वाहा॥
॥ इति नवग्रहमन्त्रः सम्पूर्णम्॥
॥श्रीनवग्रहस्तोत्र॥
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महद्युतिम्‌। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्‌॥ १॥
दधिशङ्खतुषाराभं क्शीरोदार्णवसंभवम्‌। नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्‌॥ २॥
धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्‌। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्‌॥ ३॥
प्रियङ्‌गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्‌। सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्‌॥ ४॥
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम्‌। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्‌॥ ५॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्‌। सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्‌॥ ६॥
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌। छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌॥ ७॥
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्‌। सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्‌॥ ८॥
लाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्‌। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्‌॥ ९॥
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः। दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्‍नशान्तिर्भविष्यति॥ १०॥
नरनारीनृपाणां च भवेद्दुःस्वप्ननाशनम्‌। ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम्‌॥
गृहनक्शत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुद्‌भवाः। ताः सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशयः॥
॥ इति श्रीव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं संपूर्णम्‌॥
नवग्रह अष्ट एवं चतुर्दल देवता पूजन
॥ नवग्रह देवता पूजन॥
आकृष्णेनाङ्गीरसो हिरण्यस्तुपः सविता त्रिष्टुप्‌ सुर्यावाहने विनियोगः॥ हिरण्ययेन सवितारतेन्‌ देवो याति भुवनानि पश्यन्‌ सूर्याय नमः। सूर्यं आवाहयामि॥ आप्यायस्वेति गौतमः सोमो गायत्रि चन्द्रावाहने विनियोगः॥ ॐ आप्यायस्वसमेतुते विश्वतः सोमवृष्णं भववाजस्यसन्घदे संघदे चंद्राय नमः। चन्द्रं आवाहयामि॥ अग्नि मूर्ध विरूपाङ्गारको गायत्रि अङ्गारकावाहने विनियोगः॥ ॐ अग्निमूर्धादिवः ककुथ्पतिः प्रतिव्यायं आपां रेतांसि जिंवति अङ्गारकाय नमः। अंगारकं आवाहयामि॥ उद्भुद्दद्वं सौम्यो बुधः त्रिष्टुप्‌ बुधावाहने विनियोगः॥ ॐ उद्भुद्दद्वं समनसः सखायः समग्नि विंद्वं बहवः सनीलः दधिक्रामग्नि मशसंच देवीमिंद्रवतो वसनिह्वयेवः बुधाय नमः। बुधं आवाहयामि॥ बृहस्पते घृत्समधो बृहस्पतित्रिष्टुप्‌ बृहस्पत्यावाहने विनियोगः॥ बृहस्पते अथियदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति कृतुमज्जनेषु यद्धिदयश्चवास रत प्रजाततदस्मासुद्रविणं देहि चित्रं बृहस्पतये नमः। बृहस्पतिं आवाहयामि॥ शुक्रांते भारद्वाजः शुक्रः त्रिष्टुप्‌ शुक्रावाहने विनियोगः॥ ॐ शुक्रांते अन्यद्य जतन्ते अन्यद्विशुरुषे अहनि दौरिवासि विश्वहिमाया अवसि स्वाध्वो भद्रते पूशन्निहिरातिरस्तु शुक्राय नमः। शुक्रं आवाहयामि॥ शमग्निरिरिंबिरः शनैश्चर उष्णिक्‌ कन्यावाहाने विनियोगः॥ ॐ शमग्निराग्निभिः करश्चन्न तपतु सूर्यः शंवातो वात्वरपा अपसृधः शनैश्चराय नमः। शनैश्चरं आवाहयामि॥ कयानो वामदेवो राहुर्गयत्रि राह्वाहने विनियोगः॥ ॐ कयानाशित्र आभूव दूथि सदावृधः सखा कयाशचिष्टया वृथा राहवे नमः। राहुं आवाहयामि॥ केतुं कृण्वन्‌ मधुश्चंदः केतुर्गायत्रि केत्वावाहने विनियोगः॥ ॐ केतु कृण्वन्‌ केतवे पेशोमर्य आपेशसे समुषड्‌भिरजायतः केतवे नमः। केतुं आवाहयामि॥॥ अष्टदल देवता पूजन॥ ॐ इंद्राय नमः। अग्नये नमः। यमाय नमः। नैऋतये नमः। वरुणाय नमः। वायवे नमः। सोमाय नमः। ईशानाय नमः।॥ चतुर्दल देवता॥ ॐ गणपतये नमः। ॐ दुर्गायै नमः। ॐ क्षेत्रपालाय नमः। ॐ वसोष्पतये नमः। रव्यादि नवग्रह अष्टदल चतुर्दलेषु स्थित सर्वदेवताभ्यो नमः॥ ध्यायामि ध्यानं समर्पयामि। आवाहनं समर्पयामि। आसनं समर्पयामि। पाद्यं समर्पयामि। अर्घ्यं समर्पयामि। आचमनं समर्पयामि। स्नानं समर्पयामि। वस्त्रं समर्पयामि। यज्ञोपवीतं समर्पयामि। गंधं धूपं दीपं समर्पयामि। नैवेद्यं समर्पयामि। मन्त्रपुष्पं समर्पयामि। सकल पूजार्थे अक्षतान्‌ समर्पयामि॥ यस्य स्मृत्याच नाम्नोक्त्या तपः पूजा क्रियादिषु। नूनं संपूर्णतां यादि सद्यो वंदे तमच्युतं॥


Sunday, 1 May 2016

शिव लिंग के प्रकार एवं महत्त्व



शिव लिंग के प्रकार एवं महत्त्व
1. मिश्री(चीनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।
2. सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर बने शिवलिंग कि पूजा से वशीकरण और अभिचार कर्म के लिये किया जाता हैं।
3. फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं।
4. जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं।
5. किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।
6. यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
7. यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है।
8. दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं।
9. गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं।
10. आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं।
11. कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं।
12. यदि दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं।
13. स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।
14. मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं।
Astrologer Gyanchand Bundiwal 08275555557,,,
15. स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं।
16. चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।
17. पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।
18. लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं।
19. बिबर के मिट्टी के बने शिवलिंग का पूजन विषैले प्राणियों से रक्षा करता है।
20. पारद शिवलिंग का अभिषेक सर्वोत्कृष्ट माना गया है।