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Sunday, 6 September 2020

कर्क राशि एवं लग्न

कर्क लग्ने समुत्पन्नो धर्मो भोगी जहप्रियः। मिष्ठान्न भुक्त साधुरतो विनितो सौभाग्यधन संयुतः।। परदेशगः सुधीरः साकर्क लग्ने समुत्पन्नो धर्मो भोगी जहप्रियः। मिष्ठान्न भुक्त साधुरतो विनितो सौभाग्यधन संयुतः।। परदेशगः सुधीरः साहसकर्मा जलाधिगतवित्त:। स्त्रीभुषणाम्बर सुखै भोगैश्च समन्वितो भवति।। भचक्र में कर्क राशि चतुर्थ क्रम में पड़ती है। इसका विस्तार ९० अंश से १२० अंश के अंदर माना जाता है। इस राशि के अंतर्गत पुनर्वसु (चतुर्थ चरण) पुष्य के चारोचरण एवं आश्लेषा के चारो चरण सम्मिलित है। पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु, पुष्य का शनि, तथा आश्लेषा का स्वामी बुध माना जाता है। कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। आकाश मंडल में इसका स्वरूप केकड़े का जैसा है। इस राशि के अन्य पर्याय नाम कर्कट, कीट, कूर्म, कुलीर, शंशाकभ, सलिलचर, षोडश पाद एवं चान्द्र है। यह राशि कोमलता, सहानुभूति ईमानदारी, पवित्रता, मिलनसार, संवेदनशील, एवं भावुकता की प्रतीक मानी गई है। यह राशि चर (परिवर्तन शील) जलतत्त्व से युक्त, ब्राह्मण वर्ण, स्त्रीजाति, सौम्य लेकिन कफ प्रकृति, रजोगुणी, रात्रिबली, सम संज्ञक, रक्त-श्वेत वर्ण एवं उत्तर दिशा की स्वामिनी मानी जाती है। इस राशि का स्वामी चंद्र है यह शुभ सौम्य राशि की प्रथम नवांश राशि कर्क की होती है। इस राशि पर गुरु ५ अंश पर परमोच्च रहता है। जबकि मंगल इस राशि के २८ अंश पर परमनीच का होता है। निरयण सूर्य इस राशि पर लगभग १६ जुलाई से १५ अगस्त के बीच संचार करता है। कर्क राशि के गुण-विशेषताएं संवेदनशील, ईमानदार, गुणग्राह्य, परिवर्तनशील, भावुक, मिलनसार, जल्दबाज, दुखी प्राणी के प्रति दया, सहानुभूति, उदारता, कल्पनाशील प्रकृति, हँसमुख, चंचल परन्तु परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने की प्रकृति, संगीत व सौंदर्य के प्रति रुचि, सहृदयता, कार्य तत्परता, आदि गुण विशेष रूप में पाए जाते है। इस राशि का संबंध पेट, हृदय एवं गुर्दे से है। यदि किसी जातक की नाम राशि, जन्म राशि एवं लग्न राशि समान हो तो ये गुण जातक में अधिक मिलेंगे। शारीरिक संरचना कर्क राशि/लग्न के जातक का रंग गोरा, गोल सुंदर व आकर्षक चेहरा, भरे हुए गाल, मध्यम कद, छोटी किंतु कुछ उठी हुई नाक, आंखे काली या थोड़ा भूरापन लिये हुए, चौड़ी छाती, हाथपैर अपेक्षाकृत छोटे, बाल्यकाल में दुबला पतला शरीर किंतु आयु वृद्धि के साथ पुष्ट शरीर हो जाता है। व्यक्तिगत विशेषताएं चर व जलीय राशि होने के कारण कर्क के जातक संवेदनशील, भावुक हृदय, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, कल्पनाशील, किसी भी बात या विषय को शीघ्र समझने वाले, दुसरो की भावना व विचारों का सम्मान करने वाले, नवीनता व परिवर्तन प्रिय, देश-विदेश में यात्राएं करने के शौकीन, न्याय प्रिय व दयालु स्वभाव, शीघ्र क्रोधित व शीघ्र शांत हो जाने वाले, व्यवहार कुशल, अतिथि सत्कार में तत्पर, हँसमुख, अपने मित्र व पारिवारिक कार्यो में हर प्रकार से सहायक, कुटुम्ब में श्रेष्ठ व सम्मानित होते है। ये जातक जब तक विशेष रूप से सताए ना जाये तब तक किसी का अहित नही करते और एक बार उत्तेजित हो जाये तो छोड़ते नही। इनकी जलीय व प्राकृतिक वस्तु के प्रति विशेष रुचि होती है। कर्क लग्न की कुंडली मे यदि गुरु व मंगल शुभ हो तो ऐसा जातक धार्मिक प्रवृत्ति वाला, परोपकारी, उदार हृदय, उच्चाकांक्षी, स्वाभिमानी तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति अत्यंत संवेदनशील होगा। उच्च व्यावसायिक शिक्षा जैसे उच्च-प्रशासनीय कंपटीशन, डॉक्टरी, वकालत, इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, आदि क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने की क्षमता होती है। इनकी कुंडली मे यदि चंद्र-शुक्र शुभस्थ हो अथवा इन ग्रहों की शुभ दृष्टि हो, तो सौन्दर्यानुभूति विशेष अधिक होगी। चित्रपट, दूरदर्शन, सिनेमा आदि में तथा गायन , संगीत, एवं साहित्य में भी अधिक झुकाव रहे। पठन पाठन एवं लेखनादि कार्यो में भी रुचि लेते है। ये लोग नए नए विषयो को जानने के लिये भी उत्सुक रहते है। कर्क के जातक यद्यपि दूसरे व्यक्ति के अन्तरभावो को शीघ्र समझने में सक्षम होता है। परन्तु आवेश में शीघ्र विश्वास कर लेने के कारण अनेको बार धोखा भी खाता है। चंद्रमा की कलाओं की भांति कर्क जातक के स्वभाव एवं जीवन मे समरसता नही आ पाती बल्कि परिवर्तन होता रहता है। इनके जीवन का उत्तरार्ध भाग अपेक्षाकृत अधिक भाग्यशाली होता है। यदि कुंडली मे चंद्र - मंगल अशुभ हों या किसी पाप ग्रह से युत या दृष्ट हों तो जातक वासनाप्रिय, कामुक, आरामतलब, अस्थिर एवं उद्विग्न मन वाला, हठधर्मी, दुसरो के बहकावे में शीघ्र आने वाला, जल्दबाजी में आवेश पूर्वक बिना सोचे काम करने वाला, अधीर एवं कुछ मूडी प्रकृति रखे अर्थात किसी के द्वारा की गई थोड़ी सी अवहेलना से शीघ्र उत्तेजित हो जाये तथा कठिन परिस्थितियों में कोई एक बात को लेकर बहुत सोच विचार में लगा रहे। चंद्र शुक्र अशुभ होने की स्थिति में जातक अत्यधिक तनाव एवं चिंता से परेशान होकर शराब, तम्बाकू, मास, आदि तामसिक भोजन की और आकृष्ट हो जाता हैं। इन जातकों को अपनी इसी कमजोरी से विशेष सावधान होना चाहिये। कर्क राशि/लग्न की कन्या सभी जातको का प्रेम-वैवाहिक जीवन एवँ अनुकूल साथी चुनाव कर्क लग्न में जन्म लेने वाली कन्या का गोल सुंदर चौड़ा चेहरा, गोरा रंग, उभरे हुए सुंदर गाल, श्वेत वर्ण, आंखे काली कुछ नीलिमा अथवा भूरापन लिये हुए, हाथ पैर अपेक्षाकृत कुछ छोटे, मध्यम कद, दुबलपतला कोमल शरीर, परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर पुष्ट व कुछ स्थूल होने की भी संभावना रहती है। कर्क लग्न जातिका के लग्न का स्वामी चंद्र तथा मंगल शुभ हो, तो जातिका बुद्धिमान, हँसमुख, भावुक, संवेदनशील, परिश्रमी, परोपकारी, नेक व दयालु हृदय की होती है। व्यवहार कुशल, धार्मिक विचारों से युक्त, अथिति सत्कार में तत्पर रहेगी। चर व जलीय राशि होने के कारण ये कन्या चंचल, परिवर्तनशील एवं कल्पनाशील स्वभाव की होती है। इनके जीवन मे अनेक प्रकार के उच्च नीच परिवर्तन होते रहते है। चंद्र यदि अशुभ हो तो शीघ्र क्रोधित शीघ्र शांत होने की प्रकृति रहेगी। चंद्रमाकी घटती बढ़ती कलाओं के अनुसार ही इनके स्वभाव में भी परिवर्तन होता रहेगा फिर भी ऐसी जातिका परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम रहती है। चंद्र मंगल व गुरु शुभ होने की स्थिति में उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त होने की संभावना रहती है। अध्यापन, गृहविज्ञान, प्रशासकीय प्रतियोगिता, मेडिकल, फैशन डिजाइनिंग, होटल मैनेजमेंट, नर्सिंग, श्रृंगार संबंधित व्यवसाय, सौन्दर्यानुभूति विशेष रूप से रहती है। प्राकृतिक सौनदयर, नृत्य, संगीत, गायन एवं कला में भी रुचि लेती है। इन्हें देश विदेश की यात्रा करने का शौक होता है। शुक्र के प्रभाव से जातिका गुणवान एवं अपने परिवार व समाज से सम्मान पाने वाली होती है। बौद्धिक कार्यो में विशेष रुचि रहने तथा प्रकृति के नए नए विषयो को जानने की इच्छुक रहती है। ये परोपकारी व उदार हृदय रहने के बाद भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नही आने देती। ये दुसरो को भाव को शीघ्र जान लेती है फिर भी भावुक स्वभाव होने के कारण शीघ्र धोखा भी का जाती है। मंगल, चंद्र यदि अशुभ हो तो रक्त विकार, गले, स्वास के रोग, स्नायु दुर्बलता प्रमेह, रक्त प्रदर गर्भाशय संबंधित रोग, मानसिक दबाव, हिस्टीरिया आदि रोगों की संभावना रहती है। इनके वैवाहिक जीवन की सफलता कुंडली मे गुरु व शनि की शुभ व अशुभ स्थिति पर निर्भर करेगी। गुरु व शनि १,३,५,७,९,११ भाव में हो तो मनोवांछित जीवन साथी मिलने की संभावना रहती है। इस ग्रह योग में उच्च पदासीन अथवा सम्पन्न एवं उच्चशिक्षित जीवन साथी के योग बनेंगे, विवाह के उपरांत पति-पत्नी दोनों के लिये भाग्योन्नति होगीं। सामान्यतः कर्क लग्न की महिलाए अपने पति, बच्चो व परिवार के प्रति निष्ठावान एवं समर्पित भाव रखती है अपनी महात्त्वकांक्षाओ का भी इनके लिये त्याग कर देती हैं। स्वास्थ्य और रोग कर्क लग्न के जातक बाल्यकाल में प्रायः दुर्बल होते हैं। परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर एवं स्वास्थ्य का विकास होता जाता हैं। कला पुरुष के वक्ष स्थल और पेट पर कर्क राशि वास माना जाता हैं। यदि यह राशि अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट होतो कर्क जातक को अत्यधिक मानसिक तनाव, गुप्त चिंताएं, स्वास, खांसी, गले, कफ जन्य रोग, फेंफड़ो के रोग, स्नायु दुर्बलता, मिर्गी, पित्ताशय में पथरी आदि पेट के रोग, रक्त विकार, अनिद्रा, प्रेमह, मधुमेह, मंदाग्नि, चित्त-विभ्रम, उद्वेग तथा मानसिक एव हृदय रोगों की संभावना अधिक रहती है। कर्क जातको को उत्तेजक व तामसिक पदार्थो का सेवन से परहेज करना चाहिए। इन्हें धैर्य, सहनशीलता एवं आध्यात्मिकता को ग्रहण करना चाहिए तथा अधीरता एव अत्यधिक भावुकता को त्यागना चाहिये। कर्क राशि लग्न जातको की आर्थिक स्थिति शिक्षा एवं रोजगार कर्क जातक की कुंडली मे चंद्र, सूर्य, मंगलादि ग्रह, शुभ भावस्थ या शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो अगर लिखित व्यवसायों में से किसी एक मे विशेष लाभ व उन्नति पा सकता है। इनमे बिजली संबंधित कार्य, भूमि जायदाद क्रय-विक्रय, वस्त्र उद्योग, स्टेशनरी, स्त्री सौंदर्य संबधी, सेल्समेन-प्रतिनिधि, केमिस्ट्, कम्प्यूटर इंजीनियर, डॉक्टर, वैद्य, सर्जन, वस्त्र उद्योग क्रय-विक्रय, रेस्टॉरेंट, पेय पदार्थ(कोल्ड्रिंक, शराब)आदि, ज्यूलर्स, सिनेमा, कलाकार, कृषि उद्योग, अध्यापन, धर्म गुरु, उपदेशक, सुनार, सेना, फोटोग्राफी, गायन, संगीत, बेकर्ज, नर्सिंगहोम, होटल, फास्टफूड, फैशन डिजाइनिंग, हेल्थ क्लब, स्पोर्ट्स, यातायात, नेवी व समुद्री जहाज संबंधी, आयात-निर्यात, डिपार्टमेंटल स्टोर, लेखन, वकालात, आदि मानसिक कार्य, धार्मिक, एवं प्राचीन, सांस्कृतिक पुस्तको के प्रकाशन व स्त्री के सहयोग से चलने वाले कार्य विशेष शुभ एव लाभदायक रहते है। आर्थिक स्थिति कर्क जातक की आर्थिक स्थिति चंद्र, सूर्य, शुक्र एवं मंगल आदि ग्रहों पर विशेष तौर पर निर्भर करती है।यदि उपरोक्त ग्रह जन्म कुंडली, नवमांश, चलित कुंडली मे शुभ भावस्थ एवं शुभ दृष्टि हो तो ऐसे जातक की आर्थिक स्थिति अत्यंत अच्छी होगी तथा धन संपदा वाहन सुख की प्राप्ति होगी। आय के साथ साथ खर्च भी उच्च स्तरीय होंगे, पत्नी का सहयोग आर्थिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण होगा। चंद्र यदि शनि राहु के प्रभाव में हो तो जातक को शेयर सट्टे आदि के द्वारा भी धन की संभावनाए रहती है। सावधानी शेयर सट्टा लाटरी द्वारा जातक को कई बार (ग्रह स्थिति के अनुसार) हानि भी उठानी पड़ती है। कर्क लग्न में भावानुसार ग्रहों का फल व शुभाशुभ ग्रह योग सूर्य २-३-५-७-९-१० एवं ११ वे भाव मे प्रायः शुभ तथा अन्य भाव मे अशुभ फल प्रदायक होता है। चंद्र २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है। मंगल २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में प्रायः शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है। बुध १-३-५-९-११ एवं १२ वे भाव मे शुभ एव अन्य भावो में मिश्रित फल देगा। गुरु १-२-५-७-९-१०-११ भाव में शुभ तथा अन्य भावो में अशुभ फल देगा। शुक्र १-३-४-५-९-१०-११ वे भावो में शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित फल देता है। शनि लग्न में स्वास्थ्य, द्वितीय में धन, तृतीय में स्वास्थ्य व संतान, चतुर्थ में कार्य व्यवसाय व स्वास्थ्य के लिये हानिकारक लेकिन सवारी आदि के लिये शुभ, पंचम में संतान और छठे में शत्रु की हानि, सप्तम में शरीर कष्ट, अष्टम में धन की तंगी किंतु आयु वृद्धि, नवम में भाई के सुख में कमी, दशम में व्यावसायिक परेशानी, ११ वे में स्वास्थ्य हानि एवं संतान चिंता तथा १२ वे भाव मे धन का अपव्यय कराता है। राहु ३-६-११-१२ वे भाव में शुभ एव अन्य भावो में अशुभ माना जाता है। केतु २-५-६-९ एवं १२ भाव मे शुभ कभी मिश्रित तथा अन्य में अशुभ फल देगा। शुभाशुभ ग्रह योग चंद्र-मंगल केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से यह योग अत्यंत शुभ है। यह योग २-४-५-७-९-१० एव ११ वे भावो में शुभ फल देता है इस योग के प्रभाव से जातक को उच्च शिक्षा, उच्चपद, भूमि-जायदाद, संतान आदि सुखों की प्राप्ति होती है। मंगल-शुक्र केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से इस योग के प्रभावस्वरूप मकान, वाहन, उच्चशिक्षा, स्त्री-संतानादि सुखों की प्राप्ति, एवं जातक उच्च प्रतिष्ठित होता है। यह योग १-२-४-५-७-९-१०-११ वे भावो में विशेष फल देगा। मंगल-गुरु १-२-४-५-९ एवं १० वे भाव मे शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित प्रभाव करेगा। दवाइयां इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, सेना आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता दिलवाता है। मंगल-शनि कर्क जातक की कुंडली मे मंगल-शनि प्रायः दो परस्पर विरुद्ध ग्रहों का योग मिश्रित फलदायक रहेगा। यह १-३-५-७-९-१०-११ वे भाव मे थोड़ा अच्छा फल देगा। इंजीनियरिंग, मेडिकल, कारखाने आदि के कार्यो में सफलता मिलेगी। लेकिन अत्यंत संघर्ष व तनाव भी रहे। चंद्र-गुरु यह योग सुख समृद्धि भाग्यलाभ व उन्नति देने वाला होगा। लेकिन सफलता विघ्न बाधाओं के बाद मिलेगी। बुध-शुक्र सदोष होने पर भी यह योग बलवान है। २-४-९-१०-११ वे भावो में विशेष फलित होता है। यह योग जातक को धन, संपदा, वाहन, स्त्री आदि सुखों से युक्त तथा विवाह के बाद स्त्री से लाभान्वित करवाता है। इस योग के प्रभाव से रहन सहन पर उच्च स्तरीय खर्च होते है। बुध-शनि यह योग दोष युक्त होने पर भी बलवान है। इस योग के फलस्वरूप बृहद स्तर पर अत्यधिक व्यय करने पर ही आय के साधन बनते है। सूर्य-मंगल यह योग १-४-६-७-८-११-११२ वे भावो में अशुभ तथा २-३-५-९-१० भावो में शुभ होता है इसके प्रभावस्वरूप जातक धन-संपदा, वाहनादि सुखों से युक्त तथा पिता और सरकारी क्षेत्र से लाभ उठाने वाला होता है। सूर्य-शनि २-५-९-१० भावो में धन-स्त्री आदि की दृष्टि से शुभ परन्तु धन लाभ जैसे शुभ फल अत्यंत संघर्ष के बाद मिलते है। कर्क कुंडली मे गुरु-शुक्र, गुरु-शनि तथा बुध-गुरु के योग शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करते है कर्क लग्न में लग्न में।चंद्र और दशम में सूर्य मेष राशि का हो तो राजयोग कारक होता है। कर्क राशि/लग्न के जातकों के लिए दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभाशुभ विचार कर्क लग्न में चंद्र, मंगल, गुरु व शुक्र ग्रहों की दशा अन्तर्दशाये प्रायः शुभ फल दायक होती है। शुभस्थ चंद्र मंगल की दशा अन्तर्दशा में शारीरिक सुख, धन लाभ, उच्च विद्या की प्राप्ति, भाई-बहन व पिता का सुख सहयोग मिलता है। मंगल-शुक्र में सुख साधनों की वृद्धि, ऐश्वर्य एवं सौंदर्य, संगीत-सिनेमा आदि में रुचि, मदिरा तम्बाकू आदी के सेवन में रुचि बढ़ेगी, चंद्र-गुरु की दशा अन्तर्दशा में धार्मिक कार्यो में रुचि, श्रेष्ठ एवं गुरुजनों आदि की संगत में सत्संग लाभ मिलता है। धार्मिक एवं सहभ कार्यो पर व्यय होते है। मंगल-गुरु-शुक्रादी शुभ ग्रहों की दशाओं में मनोवांछित पद (नौकरी) की प्राप्ति, विवाह एवं संतान सुख, विदेश यात्रा आदि की संभावनाए बढ़ेंगी, यदि मंगल, गुरु शुक्र आदि अशुभ भावस्थ हो तो उपरोक्त सुख साधन और धन लाभ में कमी, विघ्न बढ़ाओ के पश्चात सोची हुई योजनाओ में असफलता मिलने के आसार बढ़ते है। बुध, शनि, राहु, केतु, की दशा अन्तर्दशा में प्रायः अशुभ फल ही प्राप्त होते है। ध्यान रहे उपरोक्त ग्रहों के फलादेश में भाव-राशि की स्थिति तथा ग्रहों की शुभ-अशुभ दृष्टि के अनुसार फलादेश की मात्रा न्यूनाधिक भी हो सकती है। गोचर विचार ग्रहों के फलादेश करते समय गोचर ग्रहों के फल का भी विचार कर लेना चाहिए। शुभाशुभ विचार शुभ रंग लाल, सफेद, क्रीम, गुलाबी, हल्का पीला, संतरी रंग ज्यादा अनुकूल एवं लाभदायक रहेंगे। अशुभ रंग काला, नीला, हरा। शुभ रत्न चांदी की अंगूठी में सफेद मोती अथवा चंद्रकांत मणि, विधिपूर्वक धारण करना शुभ रहेगा। भाग्यशाली दिन रविवार, सोमवार, मंगलवार व शुक्रवार शुभ व अनुकूल रहेंगे, गुरुवार मध्यम फलदायी रहेगा जबकि बुधवार यात्रा व पूंजी निवेश के लिये सामान्य शुभ रहेगा तथा सह्निवार अशुभ फल देगा। शुभांक ४-८-१ क्रमशः भगायशाली अंक रहेंगे जबकि ३ व ५ अंक इनके लिये अशुभ व २-७ मध्यम शुभ माने जाते है। भाग्योदय कारक वर्ष २४-२८-२९-३१-३७ एव ४३ वा वर्ष भाग्योन्नति कारक होगा। हसकर्मा जलाधिगतवित्त:। स्त्रीभुषणाम्बर सुखै भोगैश्च समन्वितो भवति।। भचक्र में कर्क राशि चतुर्थ क्रम में पड़ती है। इसका विस्तार ९० अंश से १२० अंश के अंदर माना जाता है। इस राशि के अंतर्गत पुनर्वसु (चतुर्थ चरण) पुष्य के चारोचरण एवं आश्लेषा के चारो चरण सम्मिलित है। पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु, पुष्य का शनि, तथा आश्लेषा का स्वामी बुध माना जाता है। कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। आकाश मंडल में इसका स्वरूप केकड़े का जैसा है। इस राशि के अन्य पर्याय नाम कर्कट, कीट, कूर्म, कुलीर, शंशाकभ, सलिलचर, षोडश पाद एवं चान्द्र है। यह राशि कोमलता, सहानुभूति ईमानदारी, पवित्रता, मिलनसार, संवेदनशील, एवं भावुकता की प्रतीक मानी गई है। यह राशि चर (परिवर्तन शील) जलतत्त्व से युक्त, ब्राह्मण वर्ण, स्त्रीजाति, सौम्य लेकिन कफ प्रकृति, रजोगुणी, रात्रिबली, सम संज्ञक, रक्त-श्वेत वर्ण एवं उत्तर दिशा की स्वामिनी मानी जाती है। इस राशि का स्वामी चंद्र है यह शुभ सौम्य राशि की प्रथम नवांश राशि कर्क की होती है। इस राशि पर गुरु ५ अंश पर परमोच्च रहता है। जबकि मंगल इस राशि के २८ अंश पर परमनीच का होता है। निरयण सूर्य इस राशि पर लगभग १६ जुलाई से १५ अगस्त के बीच संचार करता है। कर्क राशि के गुण-विशेषताएं संवेदनशील, ईमानदार, गुणग्राह्य, परिवर्तनशील, भावुक, मिलनसार, जल्दबाज, दुखी प्राणी के प्रति दया, सहानुभूति, उदारता, कल्पनाशील प्रकृति, हँसमुख, चंचल परन्तु परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढाल लेने की प्रकृति, संगीत व सौंदर्य के प्रति रुचि, सहृदयता, कार्य तत्परता, आदि गुण विशेष रूप में पाए जाते है। इस राशि का संबंध पेट, हृदय एवं गुर्दे से है। यदि किसी जातक की नाम राशि, जन्म राशि एवं लग्न राशि समान हो तो ये गुण जातक में अधिक मिलेंगे। शारीरिक संरचना कर्क राशि/लग्न के जातक का रंग गोरा, गोल सुंदर व आकर्षक चेहरा, भरे हुए गाल, मध्यम कद, छोटी किंतु कुछ उठी हुई नाक, आंखे काली या थोड़ा भूरापन लिये हुए, चौड़ी छाती, हाथपैर अपेक्षाकृत छोटे, बाल्यकाल में दुबला पतला शरीर किंतु आयु वृद्धि के साथ पुष्ट शरीर हो जाता है। व्यक्तिगत विशेषताएं चर व जलीय राशि होने के कारण कर्क के जातक संवेदनशील, भावुक हृदय, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, कल्पनाशील, किसी भी बात या विषय को शीघ्र समझने वाले, दुसरो की भावना व विचारों का सम्मान करने वाले, नवीनता व परिवर्तन प्रिय, देश-विदेश में यात्राएं करने के शौकीन, न्याय प्रिय व दयालु स्वभाव, शीघ्र क्रोधित व शीघ्र शांत हो जाने वाले, व्यवहार कुशल, अतिथि सत्कार में तत्पर, हँसमुख, अपने मित्र व पारिवारिक कार्यो में हर प्रकार से सहायक, कुटुम्ब में श्रेष्ठ व सम्मानित होते है। ये जातक जब तक विशेष रूप से सताए ना जाये तब तक किसी का अहित नही करते और एक बार उत्तेजित हो जाये तो छोड़ते नही। इनकी जलीय व प्राकृतिक वस्तु के प्रति विशेष रुचि होती है। कर्क लग्न की कुंडली मे यदि गुरु व मंगल शुभ हो तो ऐसा जातक धार्मिक प्रवृत्ति वाला, परोपकारी, उदार हृदय, उच्चाकांक्षी, स्वाभिमानी तथा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति अत्यंत संवेदनशील होगा। उच्च व्यावसायिक शिक्षा जैसे उच्च-प्रशासनीय कंपटीशन, डॉक्टरी, वकालत, इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, आदि क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने की क्षमता होती है। इनकी कुंडली मे यदि चंद्र-शुक्र शुभस्थ हो अथवा इन ग्रहों की शुभ दृष्टि हो, तो सौन्दर्यानुभूति विशेष अधिक होगी। चित्रपट, दूरदर्शन, सिनेमा आदि में तथा गायन , संगीत, एवं साहित्य में भी अधिक झुकाव रहे। पठन पाठन एवं लेखनादि कार्यो में भी रुचि लेते है। ये लोग नए नए विषयो को जानने के लिये भी उत्सुक रहते है। कर्क के जातक यद्यपि दूसरे व्यक्ति के अन्तरभावो को शीघ्र समझने में सक्षम होता है। परन्तु आवेश में शीघ्र विश्वास कर लेने के कारण अनेको बार धोखा भी खाता है। चंद्रमा की कलाओं की भांति कर्क जातक के स्वभाव एवं जीवन मे समरसता नही आ पाती बल्कि परिवर्तन होता रहता है। इनके जीवन का उत्तरार्ध भाग अपेक्षाकृत अधिक भाग्यशाली होता है। यदि कुंडली मे चंद्र - मंगल अशुभ हों या किसी पाप ग्रह से युत या दृष्ट हों तो जातक वासनाप्रिय, कामुक, आरामतलब, अस्थिर एवं उद्विग्न मन वाला, हठधर्मी, दुसरो के बहकावे में शीघ्र आने वाला, जल्दबाजी में आवेश पूर्वक बिना सोचे काम करने वाला, अधीर एवं कुछ मूडी प्रकृति रखे अर्थात किसी के द्वारा की गई थोड़ी सी अवहेलना से शीघ्र उत्तेजित हो जाये तथा कठिन परिस्थितियों में कोई एक बात को लेकर बहुत सोच विचार में लगा रहे। चंद्र शुक्र अशुभ होने की स्थिति में जातक अत्यधिक तनाव एवं चिंता से परेशान होकर शराब, तम्बाकू, मास, आदि तामसिक भोजन की और आकृष्ट हो जाता हैं। इन जातकों को अपनी इसी कमजोरी से विशेष सावधान होना चाहिये। कर्क राशि/लग्न की कन्या सभी जातको का प्रेम-वैवाहिक जीवन एवँ अनुकूल साथी चुनाव कर्क लग्न में जन्म लेने वाली कन्या का गोल सुंदर चौड़ा चेहरा, गोरा रंग, उभरे हुए सुंदर गाल, श्वेत वर्ण, आंखे काली कुछ नीलिमा अथवा भूरापन लिये हुए, हाथ पैर अपेक्षाकृत कुछ छोटे, मध्यम कद, दुबलपतला कोमल शरीर, परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर पुष्ट व कुछ स्थूल होने की भी संभावना रहती है। कर्क लग्न जातिका के लग्न का स्वामी चंद्र तथा मंगल शुभ हो, तो जातिका बुद्धिमान, हँसमुख, भावुक, संवेदनशील, परिश्रमी, परोपकारी, नेक व दयालु हृदय की होती है। व्यवहार कुशल, धार्मिक विचारों से युक्त, अथिति सत्कार में तत्पर रहेगी। चर व जलीय राशि होने के कारण ये कन्या चंचल, परिवर्तनशील एवं कल्पनाशील स्वभाव की होती है। इनके जीवन मे अनेक प्रकार के उच्च नीच परिवर्तन होते रहते है। चंद्र यदि अशुभ हो तो शीघ्र क्रोधित शीघ्र शांत होने की प्रकृति रहेगी। चंद्रमाकी घटती बढ़ती कलाओं के अनुसार ही इनके स्वभाव में भी परिवर्तन होता रहेगा फिर भी ऐसी जातिका परिस्थिति अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम रहती है। चंद्र मंगल व गुरु शुभ होने की स्थिति में उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त होने की संभावना रहती है। अध्यापन, गृहविज्ञान, प्रशासकीय प्रतियोगिता, मेडिकल, फैशन डिजाइनिंग, होटल मैनेजमेंट, नर्सिंग, श्रृंगार संबंधित व्यवसाय, सौन्दर्यानुभूति विशेष रूप से रहती है। प्राकृतिक सौनदयर, नृत्य, संगीत, गायन एवं कला में भी रुचि लेती है। इन्हें देश विदेश की यात्रा करने का शौक होता है। शुक्र के प्रभाव से जातिका गुणवान एवं अपने परिवार व समाज से सम्मान पाने वाली होती है। बौद्धिक कार्यो में विशेष रुचि रहने तथा प्रकृति के नए नए विषयो को जानने की इच्छुक रहती है। ये परोपकारी व उदार हृदय रहने के बाद भी अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नही आने देती। ये दुसरो को भाव को शीघ्र जान लेती है फिर भी भावुक स्वभाव होने के कारण शीघ्र धोखा भी का जाती है। मंगल, चंद्र यदि अशुभ हो तो रक्त विकार, गले, स्वास के रोग, स्नायु दुर्बलता प्रमेह, रक्त प्रदर गर्भाशय संबंधित रोग, मानसिक दबाव, हिस्टीरिया आदि रोगों की संभावना रहती है। इनके वैवाहिक जीवन की सफलता कुंडली मे गुरु व शनि की शुभ व अशुभ स्थिति पर निर्भर करेगी। गुरु व शनि १,३,५,७,९,११ भाव में हो तो मनोवांछित जीवन साथी मिलने की संभावना रहती है। इस ग्रह योग में उच्च पदासीन अथवा सम्पन्न एवं उच्चशिक्षित जीवन साथी के योग बनेंगे, विवाह के उपरांत पति-पत्नी दोनों के लिये भाग्योन्नति होगीं। सामान्यतः कर्क लग्न की महिलाए अपने पति, बच्चो व परिवार के प्रति निष्ठावान एवं समर्पित भाव रखती है अपनी महात्त्वकांक्षाओ का भी इनके लिये त्याग कर देती हैं। स्वास्थ्य और रोग कर्क लग्न के जातक बाल्यकाल में प्रायः दुर्बल होते हैं। परन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ शरीर एवं स्वास्थ्य का विकास होता जाता हैं। कला पुरुष के वक्ष स्थल और पेट पर कर्क राशि वास माना जाता हैं। यदि यह राशि अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट होतो कर्क जातक को अत्यधिक मानसिक तनाव, गुप्त चिंताएं, स्वास, खांसी, गले, कफ जन्य रोग, फेंफड़ो के रोग, स्नायु दुर्बलता, मिर्गी, पित्ताशय में पथरी आदि पेट के रोग, रक्त विकार, अनिद्रा, प्रेमह, मधुमेह, मंदाग्नि, चित्त-विभ्रम, उद्वेग तथा मानसिक एव हृदय रोगों की संभावना अधिक रहती है। कर्क जातको को उत्तेजक व तामसिक पदार्थो का सेवन से परहेज करना चाहिए। इन्हें धैर्य, सहनशीलता एवं आध्यात्मिकता को ग्रहण करना चाहिए तथा अधीरता एव अत्यधिक भावुकता को त्यागना चाहिये। कर्क राशि लग्न जातको की आर्थिक स्थिति शिक्षा एवं रोजगार कर्क जातक की कुंडली मे चंद्र, सूर्य, मंगलादि ग्रह, शुभ भावस्थ या शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हों तो अगर लिखित व्यवसायों में से किसी एक मे विशेष लाभ व उन्नति पा सकता है। इनमे बिजली संबंधित कार्य, भूमि जायदाद क्रय-विक्रय, वस्त्र उद्योग, स्टेशनरी, स्त्री सौंदर्य संबधी, सेल्समेन-प्रतिनिधि, केमिस्ट्, कम्प्यूटर इंजीनियर, डॉक्टर, वैद्य, सर्जन, वस्त्र उद्योग क्रय-विक्रय, रेस्टॉरेंट, पेय पदार्थ(कोल्ड्रिंक, शराब)आदि, ज्यूलर्स, सिनेमा, कलाकार, कृषि उद्योग, अध्यापन, धर्म गुरु, उपदेशक, सुनार, सेना, फोटोग्राफी, गायन, संगीत, बेकर्ज, नर्सिंगहोम, होटल, फास्टफूड, फैशन डिजाइनिंग, हेल्थ क्लब, स्पोर्ट्स, यातायात, नेवी व समुद्री जहाज संबंधी, आयात-निर्यात, डिपार्टमेंटल स्टोर, लेखन, वकालात, आदि मानसिक कार्य, धार्मिक, एवं प्राचीन, सांस्कृतिक पुस्तको के प्रकाशन व स्त्री के सहयोग से चलने वाले कार्य विशेष शुभ एव लाभदायक रहते है। आर्थिक स्थिति कर्क जातक की आर्थिक स्थिति चंद्र, सूर्य, शुक्र एवं मंगल आदि ग्रहों पर विशेष तौर पर निर्भर करती है।यदि उपरोक्त ग्रह जन्म कुंडली, नवमांश, चलित कुंडली मे शुभ भावस्थ एवं शुभ दृष्टि हो तो ऐसे जातक की आर्थिक स्थिति अत्यंत अच्छी होगी तथा धन संपदा वाहन सुख की प्राप्ति होगी। आय के साथ साथ खर्च भी उच्च स्तरीय होंगे, पत्नी का सहयोग आर्थिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण होगा। चंद्र यदि शनि राहु के प्रभाव में हो तो जातक को शेयर सट्टे आदि के द्वारा भी धन की संभावनाए रहती है। सावधानी शेयर सट्टा लाटरी द्वारा जातक को कई बार (ग्रह स्थिति के अनुसार) हानि भी उठानी पड़ती है। कर्क लग्न में भावानुसार ग्रहों का फल व शुभाशुभ ग्रह योग सूर्य २-३-५-७-९-१० एवं ११ वे भाव मे प्रायः शुभ तथा अन्य भाव मे अशुभ फल प्रदायक होता है। चंद्र २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है। मंगल २-४-५-९-१० एवं १२ वे भावो में प्रायः शुभ तथा शेष भावो में अशुभ या मिश्रित फल देता है। बुध १-३-५-९-११ एवं १२ वे भाव मे शुभ एव अन्य भावो में मिश्रित फल देगा। गुरु १-२-५-७-९-१०-११ भाव में शुभ तथा अन्य भावो में अशुभ फल देगा। शुक्र १-३-४-५-९-१०-११ वे भावो में शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित फल देता है। शनि लग्न में स्वास्थ्य, द्वितीय में धन, तृतीय में स्वास्थ्य व संतान, चतुर्थ में कार्य व्यवसाय व स्वास्थ्य के लिये हानिकारक लेकिन सवारी आदि के लिये शुभ, पंचम में संतान और छठे में शत्रु की हानि, सप्तम में शरीर कष्ट, अष्टम में धन की तंगी किंतु आयु वृद्धि, नवम में भाई के सुख में कमी, दशम में व्यावसायिक परेशानी, ११ वे में स्वास्थ्य हानि एवं संतान चिंता तथा १२ वे भाव मे धन का अपव्यय कराता है। राहु ३-६-११-१२ वे भाव में शुभ एव अन्य भावो में अशुभ माना जाता है। केतु २-५-६-९ एवं १२ भाव मे शुभ कभी मिश्रित तथा अन्य में अशुभ फल देगा। शुभाशुभ ग्रह योग चंद्र-मंगल केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से यह योग अत्यंत शुभ है। यह योग २-४-५-७-९-१० एव ११ वे भावो में शुभ फल देता है इस योग के प्रभाव से जातक को उच्च शिक्षा, उच्चपद, भूमि-जायदाद, संतान आदि सुखों की प्राप्ति होती है। मंगल-शुक्र केंद्र-त्रिकोण का संबंध होने से इस योग के प्रभावस्वरूप मकान, वाहन, उच्चशिक्षा, स्त्री-संतानादि सुखों की प्राप्ति, एवं जातक उच्च प्रतिष्ठित होता है। यह योग १-२-४-५-७-९-१०-११ वे भावो में विशेष फल देगा। मंगल-गुरु १-२-४-५-९ एवं १० वे भाव मे शुभ तथा अन्य भावो में मिश्रित प्रभाव करेगा। दवाइयां इंजीनियरिंग, प्राध्यापन, सेना आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता दिलवाता है। मंगल-शनि कर्क जातक की कुंडली मे मंगल-शनि प्रायः दो परस्पर विरुद्ध ग्रहों का योग मिश्रित फलदायक रहेगा। यह १-३-५-७-९-१०-११ वे भाव मे थोड़ा अच्छा फल देगा। इंजीनियरिंग, मेडिकल, कारखाने आदि के कार्यो में सफलता मिलेगी। लेकिन अत्यंत संघर्ष व तनाव भी रहे। चंद्र-गुरु यह योग सुख समृद्धि भाग्यलाभ व उन्नति देने वाला होगा। लेकिन सफलता विघ्न बाधाओं के बाद मिलेगी। बुध-शुक्र सदोष होने पर भी यह योग बलवान है। २-४-९-१०-११ वे भावो में विशेष फलित होता है। यह योग जातक को धन, संपदा, वाहन, स्त्री आदि सुखों से युक्त तथा विवाह के बाद स्त्री से लाभान्वित करवाता है। इस योग के प्रभाव से रहन सहन पर उच्च स्तरीय खर्च होते है। बुध-शनि यह योग दोष युक्त होने पर भी बलवान है। इस योग के फलस्वरूप बृहद स्तर पर अत्यधिक व्यय करने पर ही आय के साधन बनते है। सूर्य-मंगल यह योग १-४-६-७-८-११-११२ वे भावो में अशुभ तथा २-३-५-९-१० भावो में शुभ होता है इसके प्रभावस्वरूप जातक धन-संपदा, वाहनादि सुखों से युक्त तथा पिता और सरकारी क्षेत्र से लाभ उठाने वाला होता है। सूर्य-शनि २-५-९-१० भावो में धन-स्त्री आदि की दृष्टि से शुभ परन्तु धन लाभ जैसे शुभ फल अत्यंत संघर्ष के बाद मिलते है। कर्क कुंडली मे गुरु-शुक्र, गुरु-शनि तथा बुध-गुरु के योग शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करते है कर्क लग्न में लग्न में।चंद्र और दशम में सूर्य मेष राशि का हो तो राजयोग कारक होता है। कर्क राशि/लग्न के जातकों के लिए दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभाशुभ विचार कर्क लग्न में चंद्र, मंगल, गुरु व शुक्र ग्रहों की दशा अन्तर्दशाये प्रायः शुभ फल दायक होती है। शुभस्थ चंद्र मंगल की दशा अन्तर्दशा में शारीरिक सुख, धन लाभ, उच्च विद्या की प्राप्ति, भाई-बहन व पिता का सुख सहयोग मिलता है। मंगल-शुक्र में सुख साधनों की वृद्धि, ऐश्वर्य एवं सौंदर्य, संगीत-सिनेमा आदि में रुचि, मदिरा तम्बाकू आदी के सेवन में रुचि बढ़ेगी, चंद्र-गुरु की दशा अन्तर्दशा में धार्मिक कार्यो में रुचि, श्रेष्ठ एवं गुरुजनों आदि की संगत में सत्संग लाभ मिलता है। धार्मिक एवं सहभ कार्यो पर व्यय होते है। मंगल-गुरु-शुक्रादी शुभ ग्रहों की दशाओं में मनोवांछित पद (नौकरी) की प्राप्ति, विवाह एवं संतान सुख, विदेश यात्रा आदि की संभावनाए बढ़ेंगी, यदि मंगल, गुरु शुक्र आदि अशुभ भावस्थ हो तो उपरोक्त सुख साधन और धन लाभ में कमी, विघ्न बढ़ाओ के पश्चात सोची हुई योजनाओ में असफलता मिलने के आसार बढ़ते है। बुध, शनि, राहु, केतु, की दशा अन्तर्दशा में प्रायः अशुभ फल ही प्राप्त होते है। ध्यान रहे उपरोक्त ग्रहों के फलादेश में भाव-राशि की स्थिति तथा ग्रहों की शुभ-अशुभ दृष्टि के अनुसार फलादेश की मात्रा न्यूनाधिक भी हो सकती है। गोचर विचार ग्रहों के फलादेश करते समय गोचर ग्रहों के फल का भी विचार कर लेना चाहिए। शुभाशुभ विचार शुभ रंग लाल, सफेद, क्रीम, गुलाबी, हल्का पीला, संतरी रंग ज्यादा अनुकूल एवं लाभदायक रहेंगे। अशुभ रंग काला, नीला, हरा। शुभ रत्न चांदी की अंगूठी में सफेद मोती अथवा चंद्रकांत मणि, विधिपूर्वक धारण करना शुभ रहेगा। भाग्यशाली दिन रविवार, सोमवार, मंगलवार व शुक्रवार शुभ व अनुकूल रहेंगे, गुरुवार मध्यम फलदायी रहेगा जबकि बुधवार यात्रा व पूंजी निवेश के लिये सामान्य शुभ रहेगा तथा सह्निवार अशुभ फल देगा। शुभांक ४-८-१ क्रमशः भगायशाली अंक रहेंगे जबकि ३ व ५ अंक इनके लिये अशुभ व २-७ मध्यम शुभ माने जाते है। भाग्योदय कारक वर्ष २४-२८-२९-३१-३७ एव ४३ वा वर्ष भाग्योन्नति कारक होगा।

Saturday, 5 September 2020

मेष राशि एवं लग्न

मेष विलग्ने जातः प्रचण्ड रोषो विदेश गमनरतः। लुब्ध: कृशोल्प सौख्य: स्खलिताभिधायी च।। शीघ्रगति अल्पसुतो विविधार्थयुत: सुशीलश्च।। मेष राशि चक्र की प्रथम राशि है।मेष राशि का प्रतीक मेढ़ा(भेड) है। भेड़ जितनी सीढ़ी और अनुशासन प्रिय होती है,उसका नर उतना ही उग्र एवं स्वछंदता प्रिय होता है।भचक्र में इस राशि का विस्तार 0 से 30 अंश तक है।वासंत सम्पात,सायन मेषारम्भ (२१ मार्च) यहीं से माना जाता है। मेष राशि के अन्य पर्यायवाची नाम भी है,जैसे अज, मेढ़, विश्व, आद्य, वृष्णि, तुम्बुर, छाग आदि। मेष राशि का स्वामी मंगल है।इस राशि के अंतर्गत अश्विनी, भरणी, एवं कृतिका के प्रथम चरण का समावेश रहता है। काल पुरुष के शरीर में इसका स्थान सिर, मस्तक एवं मुख है। यह राशि अग्नितत्त्व,चर संज्ञक,पुरुष जाती,क्षत्रिय एवं लाल वर्ण,हृस्व पृष्ठोदयि, युवा रजोगुणी, रात्रिबलि, उग्र प्रकृति,पित्तकारक, एवं पूर्व दिशा की स्वामिनी है। सूर्य इस राशि के 10 अंश तक उच्चस्थ होता है।तथा शनि इस राशि के 20 अंश पर नीच होता है। मेष राशि या लग्न की मूलभूत विशेषताए इस राशि या लग्न का जातक अत्यंत साहसी,उत्साही, निडर, अग्नि तत्त्व राशि होने के कारण शीघ्र उत्तेजित होने वाला,स्पष्टवादी, उच्चाभिलाषी, नेतृत्व करने में कुशल, स्वतंत्र विचार वाला, अस्थिर एवं परिवर्तनशील प्रकृति, जल्दबाजी में कई बार हानि उठाने वाला,जोखिम भरे कार्य करने वाला होता है।इसके अतिरिक्त इसका सम्बन्ध लाल वर्ण की धान्य, गेंहू, वस्त्र, सोना, मसूर, एवं भूजन्य औषधियों से भी होता है। यदि जातक की जन्म राशि एवं लग्न समान हों तो उपरोक्त गुण विशेषताए अधिक मात्रा में होती है। मेष राशि एवं लग्न में शुभाशुभ एवं योग कारक ग्रह मेष लग्न में गुरु,सूर्य एवं मंगल शुभ फल देने वाले होते है। बुध और शुक्र इस लग्न में प्रायः अशुभ फल प्रदान करते है। इस लग्न में गुरु और शनि के योग होने मात्र से भी शुभ फल नहीं मिलता है। शुक्र मारक स्थानो का अधिपति होने पर भी अकेला घातक नहीं होता चंद्र, राहु, केतु व् शनि अन्य ग्रहो के योग से शुभाशुभ फल प्रदान करते है। शुभाशुभ योग सूर्य - मंगल योग 1, 3, 5, 7, 10 और 12 वें भाव में यह योग शुभ फल प्रदान करता है अन्य में अशुभ फल देता है। सूर्य - चंद्र योग 2, 4, 5, 9 एवं 10 वें भाव में शुभ फल एवं अन्य भावो में अशुभ फल देते है। सूर्य - शुक्र तथा सूर्य - शनि के योग सदैव निष्फलि होते है। चंद्र - गुरु योग मेष लग्न के पंचम एवं नवम स्थानों में यह योग विशेष शुभ होता है। मंगल - गुरु योग लग्नेश तथा भाग्येश का योग होने से 1, 5, 9 एवं 10 वें भाव में होने से विशेष प्रशस्त माना गया है। गुरु - शनि योग 3, और 10 वें भाव में शुभ फल देता है एवं अन्य भावो में अल्प फली होता है। गुरु - शुक्र योग मेष लग्न में गुरु भाग्येश एवं व्ययेश भी है,तथा शुक्र दोनों मारक (2-7) स्थानों का स्वामी है। यह योग 7 वें तथा 9 वें भाव में शुभ एवं अन्य भावो में अशुभ होता है। मंगल - शुक्र योग केवल भाग्य स्थान में शुभ फली माना जाता है। अन्य स्थानों में निष्फलि माना जाता है। इसके अतिरिक्त बुध-मंगल का योग,बुध-गुरु का योग,चंद्र-मंगल,शुक-शनि,मंगल-शनि,तथा बुध-शनि के योग अशुभ फल प्रदायक माने जाते है। मेष राशि एवं लग्न की प्रमुख विशेषताएं मेष राशि या लग्न के जातक का सामान्यतः माध्यम कद,इकहरा परंतु सुगठित शरीर होता है।इनका चेहरा चतुष्कोण,गर्दन कुछ लंबाई लिए हुए,लालिमा लिए हुए रक्तिम गौर वर्ण,या कभी गेंहुआ रंग भी होता है,सर एवं मस्तक ऊपर से चौड़ा,आँखे गोल-रक्त वर्ण परंतु इनकी दृष्टि तेज होती है। इस राशि या लग्न की स्त्रियों के दांत सुन्दर,बाल घने, काले एवं प्रायः लंबे होते है। मेष (राशि-लग्न) की सामान्य विशेषताएं मेष लग्न में उत्पन्न जातक स्वतंत्र विचारो वाला,साहसी, स्वाभिमानी, उद्यमी, चंचल किन्तु प्रखर बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति वाला,उच्चाभिलाषी,मिलनसार तथा नए-नए मैत्री सम्बन्ध बनाने में कुशल होता है। मेष लग्न अग्नि तत्व प्रधान एवं चर राशि होने के कारण जातक दृढ निश्चयी,स्फूर्तिवान,व्यवहार कुशल, आत्मविश्वासी तथा स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम होता है। इनमे नेतृत्व की भावना शक्ति प्रबल होती है।मेष जातक वैज्ञानिक चिंतन पसंद करते है।ऐसे लोग किसी दुसरे की आधीनता या मार्गदर्शन पसंद नहीं करते है। नविन एवं मौलिक विचार उत्पन्न करने में इनकी बुद्धि विशेष कुशल होती है।ये जीवन में नई-नई योजना बनाते रहते है।इनके भीतर एवं बाहरी भाव प्रायः एक जैसे रहते है।इनमे दूसरे व्यक्ति के मनोभावों को समझलेने की अपूर्व शक्ति जन्मजात होती है।एवं संघर्ष की भावना प्रबल होती है।ये जीवन में निजी पुरुषार्थ एवं उद्धम के द्वारा लाभ एवं उन्नति प्राप्त कर लेते है। यदि इन जातको की कुंडली में चंद्र/मंगल/सूर्य अशुभ हों तो अस्थिर प्रकृति, परिवर्तनशील स्वाभाव, तथा शीघ्र ही उत्तेजित होकर प्रचंड रूप धारण करलेने का स्वाभाव हो जाता है। चंद्र/मंगल यदि नीच राशिस्थ अथवा शत्रु क्षेत्री या शत्रु ग्रहो से युत हों तो अत्यधिक क्रोधावेश में कई बार अपनी बहुत भारी हानि भी करवा बैठते है। कुंडली में बुध/मंगल यदि अशुभ हो तो भाई बहनो का सुख बहुत कम मिलता है। मेष राशि एवं लग्न के जातको की शिक्षा व्यवसाय-कैरियर,आर्थिक स्तिथि एवं स्वास्थ्य - रोग। मेष राशि अथवा लग्न के जातक क्रियात्मक (प्रैक्टिकल) अधिक होते है।अतः ये ऐसे व्यवसाय में अधिक सफल हो पाते है जिसमे उद्यम एवं शारीरिक श्रम की विशेष आवश्यकता हो। ये जातक खेल-कूद, दन्त चिकित्सा, कैमिस्ट, फ़ौज, सेनाध्यक्ष, पुलिस, बिजली एवं इलेक्ट्रॉनिक कार्य,ज्यूलर्स, बैकरी, मिठाई, आदि। यदि मंगल/गुरु आदि ग्रहो का शुभ सम्बन्ध हो तो वैद्य, चिकित्सा क्षेत्र, सिनेमा, संगीत, कम्प्यूटर, मशीनरी (इंजीनिरिंग), भूमि-जायदाद, क्रय-विक्रय, विदेशी सम्बन्ध, कम्पनी प्रतिनिधित्त्व, सरकारी क्षेत्रो से सम्बंधित कार्यो में सफलता मिलती है। सूर्य, चंद्र, गुरु, एवं शनि शुभ होने की स्तिथि में राजनीति, प्रशासनिक आर्थिक कार्यो में भी विशेष सफलता मिलती है। आर्थिक स्तिथि उच्चाकांक्षी एवं दृढ ऊर्जा-शक्ति होने की कारण मेष लग्न के जातको के पास व्यापक स्तर पर धन कमाने की क्षमता होती है। यदि जन्म पत्री में शनि/शुक्र/मंगल एवं चंद्र आदि ग्रहो की शुभ स्तिथि हो अथवा उनपर शुभ ग्रहो की द्रष्टि हो तो निजी व्यवसाय द्वारा इनमें विपुल धन सम्पदा अर्जित करने की संभावनाएं होती है। नौकरी की अपेक्षा निजी व्यापार में लाभ एवं उन्नति के विशेष योग रहते है। सामान्यतः इन्हें जीवन के आरंभिक वर्षो में (आर्थिक क्षेत्र)में विशेष उतार चढाव एवं संघर्ष का सामना कारण पड़ता है। परंतु जीवन के उत्तरार्ध में अपने परिश्रम एवं कार्य निष्ठां द्वारा आर्थिक क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त कर लेते है। स्वास्थ्य एवं रोग राशि स्वामी मंगल के कारण मेष लग्न के जातको का स्वास्थ्य प्रायः अच्छा ही रहता है।यदि किसी कारणवश कोई रोग हो जाए तो जल्दी ठीक हो जाते है।लग्नेश मंगल नीच राशिस्थ हो या अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो छोटी-मोटी दुर्घटनाये होती रहती है। विशेषकर सिर पर चोट, सिर दर्द,तीव्र ज्वर,मुँहासे मस्तिष्क विकृति, चेचक एवं त्वचा आदि और नेत्र सम्बन्धी एवं पेट विकार आदि रोगों की सम्भावना अधिक रहती है। सावधानी उच्चाभिलाषी प्रकृति होने के कारण मेष लग्न के जातक कभी-कभी अपने सामर्थ से अधिक कार्य कर जाते है।जिस कारण मानसिक तनाव,पाचन विकृति,उत्तेजना, अनिद्रा आदि मनोविकारों से ग्रस्त होते है। इन्हें हरी सब्जियों फल एवं पौस्टिक भोजन का सेवन अधिक करना चाहिए।तम्बाकू आदि मादक द्रव्य एवं मासाहार आदि तामसी भोजन से परहेज करना चाहिए एव पर्याप्त आराम और नींद भी लेनी चाहिए। मेष राशि या लग्न के जातको को बिजली कार्य,वर्कशॉप,आदि में कार्य करते समय कार, ट्रक, स्कूटर, आदि वाहन चलाते समय भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। क्रमश: अगले लेख में हम मेष लग्न राशि जातिकाओ के विषय मे चर्चा करेंगे। मेष राशि एवं लग्न की स्त्रियां मेष राशि या लग्न की स्त्री की शरीर आकृति एवं संरचना प्रायः मध्यम कद संतुलित एवं आकर्षक होती है। इनकी कुंडली में यदि मंगल-राहु एवं चंद्र शुभ हों तो ऐसी जातिका के दांत सुन्दर,घने एवं लंबे काले बाल होते है।यदि पंचमेश सूर्य भी शुभस्थ या शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, तो जातिका बुद्धिमान,चतुर,एवं स्वतंत्र विचारो वाली,स्वाभिमानी परन्तु सत्यप्रिया, उत्साहशील, फुर्तीली, मिलनसार, उच्चाकांक्षी, एवं आदर्शवादी प्रकृति की होती है। पुरुष जातको की भाँती ही इनमे भी उत्साह, गर्मजोशी, स्फूर्ति, व्यवहार कुशलता, स्पष्टवादी एवं नेतृत्व की भावना अधिक होती है। इनमे दूसरे के मनोभाव को समझने की विशेष शक्ति होती है।ये जिस व्यक्ति को पसंद करे उसे पूरी निष्ठा एवं मनोयोग से चाहती है। इनकी कुंडली में मंगल-शुक्र यदि अशुभ हो तो निरंकुश एवं स्वछंद खर्चीला स्वाभाव होता है।आवेश, क्रोध एवं भावुकता में कई बार अपना ही नुक्सान कर बैठती है। मेष राशि/लग्न की जातिका की इच्छा शक्ति अत्यंत तीव्र होती है।फिर भी ये अपने मनोभाव एवं क्रोध को संयम करके व्यवहार करें तो गृहस्थ जीवन में अत्यंत सफल होती है।ये वैवाहिक जीवन में अपने परिवार एवं पति के प्रति पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी रखती है। पार्टनर का कठोर एवं आक्रमक व्यवहार इनके लिए असहनीय हो जाता है।ये अपनी प्रतिष्ठा का विशेष ध्यान रखती है।इनकी आय चाहे सीमित हो फिर भी अपना,अपने परिवार एवं गृह के रहन-सहन के स्तर का भी विशेष ध्यान रखती है। पितरों का आशीर्वाद लें। बड़े भाई एवं भाभी की सेवा करें, फायदा होगा। लाल कनेर के फूल, रक्त चंदन आदि डाल कर स्नान करें। मूंगा, मसूर की दाल, ताम्र, स्वर्ण, गुड़, घी, जायफल आदि दान करें। मंगल यंत्र बनवा कर विधि-विधानपूर्वक मंत्र जप करें और इसे घर में स्थापित करें। मंगल मंत्र ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाया नम:।’ मंत्र के 40000 जप करें या कराएं फिर दशांश तर्पण, मार्जन व खदिर की समिधा से हवन करें। अन्य मंत्र: ''ऊँ अं अगारकाय नम: मेष राशि लग्न की जातिकाये प्रायः अपने भाई-बंधुओ एवं स्वजनों से प्रेम रखने वाली संवेदनशील और आशावादी दृष्टिकोण रखने वाली होती है। अनूकूल साथी का चुनाव मेष राशि/लग्न के जातक-जातिका को उपयुक्त जीवन साथी या पार्टनर के लिए सिंह/तुला व् धनु राशि के जातक अधिक उपयुक्त हो सकते है। मेष,मिथुन,वृश्चिक एवं कुम्भ राशि/लग्न वाले जातक के साथ मध्यम फल मिलता है। मेष राशि एवं लग्न जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख एवं दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभा-शुभ फल विचार मेष राशि एवं लग्न के जातको का प्रेम एवं वैवाहिक सुख मेष राशि अथवा लग्न के जातकों का प्रेम एवं विवाहेत्तर स्त्री सुख जन्म कुंडली में शुक्र एवं चंद्र की स्तिथि पर निर्भर करता है।यदि कुंडली में चंद्र-शुक्र के साथ मंगल भी शुभस्त हो तो जातक में विशेष सौन्द्रयाभूति होती है।वह स्त्री या विपरीत सेक्स को शीघ्र प्रभावित कर लेते है।इन्हें विवाह के बाद विशेष धन का लाभ एवं सुख के साधन प्राप्त होते है।जातक की स्त्री सुन्दर एवं गुण संपन्न होती है। कुंडली में यदि चंद्र/शुक्र एवं भौम पाप युक्त या पाप दृष्ट हों,तो स्त्री के सम्बन्ध से तनाव और कष्ट मिलता है तथा पारिवारिक उलझनों का सामना करना पड़ता है।इसी तरह का योग यदि लड़की की कुंडली में हो तो पति के साथ तनाव एवं कलह क्लेश रहता है। दशा-अंतर्दशा का फल एवं शुभा-शुभ फल विचार मेष राशि/लग्न के जातक-जातिका को सूर्य,मंगल एवं चंद्र ग्रहों की दशा-अंतर्दशा प्रायः अच्छा फल देने वाली होती है। यदि सूर्य-चंद्र शुभ भावस्थ या शुभ दृष्ट हों तो उत्तम फल के कारक होंगे।जैसे विद्या एवं प्रतिस्पर्धा में सफलता एवं भूमि ,भवन सवारी आदि सुखों की प्राप्ति होती है।बुध की दशा-अंतर्दशा अशुभ फल देगी।इनको गुरु,शुक्र,एवं शनि की दशा-अंतर्दशा मिश्रित फल देती है। गुरु की दशा-अंतर्दशा का पहला भाग शुभ एवं शेष भाग व्ययशील रहता है।शनि की प्रारंभिक दशा में कार्य विलम्ब से एवं शेष दशा में सफलता प्राप्त होगी। राहु-केतु अपने भाव/राशि एवं ग्रह के साहचर्य अनुसार ही अपनी दशा में शुभाशुभ फल प्रदान करते है। शुभ रत्न मेष राशि/लग्न के जातक को सवा आठ रत्ती का मूँगा या सवा पांच रत्ती का माणिक्य सोने की अंगूठी में तर्जनी उंगली में धारण करना शुभ एवं लाभदायक रहता है। शुभ रंग लाल,पीला,श्वेत,संतरी, हल्का नीला एवं भूरा आदि। शुभ दिन सोमवार,मंगलवार,गुरुवार,शुक्रवार,एवं रविवार के दिन सामान्यतः शुभ एवं अनूकूल रहते है। भाग्यांक मेष राशि/लग्न का भाग्यांक 9 है।यह मूलांक विशेष उथल-पुथल एवं संघर्ष का प्रतीक है।इस अंक वाला व्यक्ति अत्यंत कठिनाइयों के बाद अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।इसके अतिरिक्त 1 एवं 5 अंक भी इन जातकों के लिए शुभ रहते है। उपासना इन जातकों को गायत्री मंत्र का जप एवं श्री हनुमान उपासना करना शुभ एवं कल्याणप्रद रहती है। भाग्योदयकारक वर्ष 28, 30, 32, 36, 37 एवं 41 वां वर्ष भाग्योदय कारक सिद्ध होता है।

तुला लग्न

 तुला लग्न में दशान्तर्दशा का फल एवं अन्य शुभाशुभ ज्ञान

तुला लग्न में उत्पन्न जातक-जातिका को शुक्र, शनि, चंद्र (यदि कुंडली में शुभ हो) तो अपनी दशा अंतर्दशा में शुभ फल प्रदान करेंगे। शनि अपनी दशा या भुक्ति में भूमि सवारी का सुख, विद्या या कंपटीशन में सफलता, संतान सुख, तकनीकी विद्या में कामयाबी दिलाएगा, चंद्रमा और शुक्र अपनी दशाओं में कार्य व्यवसाय या नौकरी में लाभ उन्नति, माता एवं स्त्री का सुख, सौंदर्य प्रसाधन या सवारी आदि अन्य सुख साधनों की प्राप्ति के साथ उन पर खर्च भी कराएंगे। कुंडली में यदि शनि, चंद्र या शुक्र अशुभ हो तो उपरोक्त सुखों से विघ्न उत्पन्न होंगे।

मंगल की दशा में कुछ परेशानियों एवं विघ्नों के पश्चात धन लाभ तथा पारिवारिक सुख प्राप्त होगा। तुला लग्न में मंगल धनेश एवं मारकेश भी होने से इस दशा में दुर्घटना से चोट अथवा रक्त विकार आदि से शरीर कष्ट का भय होता है। बुध की दशा में भाग्य में कुछ सुखद परिवर्तन होने की संभावना होती है। परंतु इस दशा में विभिन्न स्थानों पर यात्रा एवं फिजूलखर्ची भी अधिक होती है।

गुरु की दशा  चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में स्थित गुरु अशुभ फल तथा अन्य भावो में प्राय: शुभ फल प्रदान करता है।

राहु-केतु  तुला लग्न में अपनी स्थिति एवं ग्रहयोग अनुसार फल प्रदान करते है।

तुला लग्न संबंधित अन्य शुभाशुभ ज्ञान एवं उपाय

शुभ रंग श्वेत हल्का नीला काला गुलाबी रंग अनुकूल रहेंगे हरे और पीले रंग के प्रयोग से बचें

शुभ नग (रत्न)  सवा रत्ती का हीरा प्लेटिनम या चांदी की अंगूठी में शुक्रवार को अथवा किसी शुभ योग में पंडित जी के परामर्श अनुसार शुभ मुहूर्त पर निम्नलिखित मंत्र का कम से कम 16 बार पाठ करके धारण करना लाभदायक रहता है।

मंत्र   द्रां द्रीं दौं सः शुक्राय नमः।

अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:

ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

शुक्र का तांत्रिक मंत्र

शुं शुक्राय नमः

द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

इस दिन श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करके ब्राह्मण दंपत्ति का तथा पांच कन्याओं का पूजन करके उन्हें चांदी, श्वेत वस्त्र, फल, बर्फी, दूध, दही, चावल आदि का दान करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा।

यदि तुला लग्न में किसी जातिका की जन्म राशि या नाम राशि धनु हो तो वैवाहिक सुख में वृद्धि के लिए श्वेत पुखराज भी धारण करवाया जा सकता है।

धन लाभ एवं वैवाहिक सुख के लिए मंगलवार का व्रत रखना तथा उस दिन गाय को मीठी रोटियां डालना शुभ होगा। कुंडली में सूर्य अशुभ हो तो रविवार का व्रत रखना तथा सूर्य भगवान को प्रतिदिन विशेष कर रविवार के दिन घृणि सूर्याय नमः मंत्र द्वारा तांबे के पात्र में जल लेकर तीन बार अर्घ देना शुभ रहता है।

शुभ दिन रविवार, सोमवार, मंगलवार, शुक्रवार तथा शनिवार शुभ होंगे बुधवार मिश्रित प्रभाव देगा जबकि गुरुवार अशुभ फलप्रद रहेगा।

शुभ अंक 3,4,5,7 मध्यमफली 8 अशुभ अंक 2,6,9 

भाग्यशाली वर्ष 16, 27, 28, 32, 34, 35, 39, 40, 41 ,42 वे वर्ष।

सावधानी तुला लग्न राशि के जातक जातकों को अत्यधिक भावुकता, भोग विलासिता, और उतावलेपन की प्रवृत्ति का यथासंभव त्याग करना चाहिए। बाह्यमुखी प्रवृतियों के कारण आप विशेष परेशान एवं अशांत रह सकते हैं। बनावट श्रृंगार कीमती वस्तु सवारी आदि सुख साधनों तथा मानक व्यसनों पर वृथा खर्चों से बचें। सात्विक एवं संतुलित भोजन करना आपके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा।

मंगल नवग्रहो में मंगल को सेनापति

 मंगल  नवग्रहो में मंगल को सेनापति का पद मिला हुआ है।यह बल, पराक्रम और पुरुषत्व का प्रमुख कारक ग्रह है।कुंडली के तीसरे, छठे भाव का और छोटे भाई का यह कारक है।इसका मेष और वृश्चिक राशि पर अधिकार होता है।मेष राशि में यह मूलत्रिकोण बली होता है तो वृश्चिक राशि में स्वराशि जितना बल पाता मतलब मूलत्रिकोण राशि से कुछ कम बल प्राप्त करता है।जिन जातको की कुण्डली में मंगल मजबूत और शुभ प्रभाव लिए होता ऐसे जातक निडर और साहसी होते है।भूमि, मकान का अच्छा सुख मंगल की शुभ और बली स्थिति प्रदान करती है कुंडली के बली चोथे भाव या बली चतुर्थेश से बली मंगल का सम्बन्ध अच्छा मकान सुख देने वाला होता है।पुलिस, मिलिट्री, सेना जैसी जॉब में उच्च पद इसी मंगल के शुभ प्रभाव से मिलती है।स्त्रियों की कुंडली में यह मांगल्य का कारक है,संतान आदि के सम्बन्ध में भी गुरु की तरह स्त्रियों की कुंडली में मंगल से भी विचार किया जाता है।कुंडली के 10वें भाव में यह दिग्बल प्राप्त करके शुभ फल देने वाला होता है एक तरह से योगकारक होता है।कर्क लग्न में पंचमेश और दशमेश होकर व् सिंह लग्न में चतुर्थेश, नवमेश केन्द्रेश त्रिकोणेश होकर प्रबल योगकारी और शुभ फल देने वाला होता है।सहन शक्ति का कारक भी यही है, जिन जातको का मंगल अशुभ होता है वह कायरो की तरह व्यवहार करते है।साहस और पराक्रम की ऐसे जातको में कमी रहती है।मेष, कर्क, सिंह, धनु, मीन लग्न में इसकी मजबूत और शुभ स्थिति होना इन लग्न की कुंडलियो के लिए आवश्यक होता है।केंद्र त्रिकोण भाव में यह अपनी उच्च राशि मकर, मूलत्रिकोण राशि मेष और स्वराशि वृश्चिक में होने पर रूचक नाम का बहुत सुंदर योग बनाता है जिसके फल राजयोग के सामान होते है कुण्डली के अन्य ग्रह और योग शुभ होने से रूचक योग की शुभता और ज्यादा बढ़ जाती है।शरीर में यह खून, मास, बल आदि का यह कारक है।जिन जातको के लग्न में मंगल होता है ऐसे जातको का चेहरा लालिमा लिए हुए होता है, ऐसे जातको की शारीरिक स्थिति भी मजबूत होती है।चंद्र के साथ मंगल का लक्ष्मी योग बनाता है जिसके प्रभाव से मंगल के शुभ फलो में ओर ज्यादा वृद्धि हो जाती है।चंद्र के बाद सूर्य गुरु के साथ इसका सम्बन्ध बहुत ही शुभ रहता है, उच्च अधिकारी बनने के लिए मंगल के साथ गुरु सूर्य का सम्बन्ध दशम भाव से होने पर सफलता प्रदान करता है।शुक्र बुध के साथ इसका सम्बन्ध सम रहता है तो शनि राहु केतु के साथ सम्बन्ध होने पर मंगल के फल नेगेटिव हो जाते है।शनि के साथ सम्बन्ध होने पर अशुभ विस्फोटक योग बनाता है तो राहु केतु के साथ अंगारक योग।मंगल की शुभता में वृद्धि करने के लिए ताबे का कड़ा, ताबे की अंगूठी, पहनना इसके शुभ प्रभाव में वृद्धि करता है।मेष, कर्क, सिंह, मीन लग्न में मूंगा पहनना मंगल की शुभता और बल में वृद्धि के लिए शुभ फल देने वाला होता है।कभी भी नीच ग्रह का रत्न नही पहनना चाहिए यदि वह योगकारी होकर भी नीच है तब भी ऐसे ग्रह का रत्न पहनना कभी शुभफल देने वाला नही होता।

मांगलिक कुंडली विचार

लग्ने व्यये पाताले, जामित्रे चाष्ट कुजे।

कन्या जन्म विनाशाय, भर्तुः कन्या विनाशकृत।।

अर्थात जन्म कुंडली में लग्न स्थान से 1, 4, 7, 8, 12वें स्थान में मंगल हो तो ऐसी कुंडली मंगलिक कहलाती है। श्लोकानुसार जिस ब्यक्ति की कुंडली में मंगल उपर्युक्त  भावों में हो तो उसे विवाह के लिए मांगलिक वर-वधू ही खोजना चाहिए। इसके अलावा यदि पुरुष या स्त्री की कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में शनि, राहु, सूर्य, मंगल हो तो कुंडली का मिलान हो जाता है। यदि एक की कुंडली में मंगल उपरोक्त  भावों में स्तिथ हो तथा दूसरे की कुंडली में नहीं हो तो इस प्रकार के जातको के विवाह संबंध नहीं होने चाहिए। यदि अनजाने में भी कोर्इ विवाह संपन्न हो जाते हैं तो या तो ऐसे संबंध कष्टकारी होते हैं या फिर दोनो में मृत्यु योग की भी संभावना हो सकती है। अत: दोष का निवारण भली भाँति कर लेना चाहिए।

कुंडली मे भावानुसार मंगल के फल

प्रथम भाव : कार्य सिद्धि में विघ्न, सिर में पीडा, चंचल प्रवृति, व्यक्तित्व पर प्रभाव, स्वभाव, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, समृद्धि, बुद्धि।

द्वितीय भाव : पैतृक सम्पति सुख का अभाव, परिवार, वाणी, निर्दयी प्रवृति, जीवन साथियो के बीच हिंसा, अप्राकृतिक मैथुन

चतुर्थ भाव :  परिवार भाइयो से सुख का अभाव, घरेलू वातावरण, संबंधी, गुप्त प्रेम संबंधी, विवाहित जीवन में ससुराल पक्ष और परिवार का हस्तक्षेप, आनुवांशिक प्रकृति।

सप्तम भाव : वैवाहिक जीवन प्रभावित, पतिपत्नी का व्यक्तित्व, जीवन साथी के साथ रिश्ता, काम शक्ति, जीवन के लिए खतरा, यौन रोग।

अष्टम भाव : मित्रों का शत्रुवत आचरण, आयु, जननांग, विवाहेतर जीवन, अनुकूल उद्यम करने पर भी मनोरथ कम, मति।

द्वादश भाव : विवाह, विवाहेतर काम क्रीड़ा, क्राम क्रीड़ा या योन संबंधो से उत्पन्न रोग, काम क्रीड़ा कमजोरी, शयन सुविधा, शादी में नुकसान, नजदीकी लोगो से अलगाव, परस्पर वैमनस्य, गुप्त शत्रु।

यदि किसी जातक को मंगल ग्रह के विपरीत परिणाम प्राप्त हो रहे हों तो उनकी अशुभता को दूर करने के लिए निम्र उपाय करने चाहिएं-

मंगल के देवता हनुमान जी हैं, अंत: मंदिर में लड्डू या बूंदी का प्रसाद वितरण करें। हनुमान चालीसा, हनुमत-स्तवन, हनुमद्स्तोत्र का पाठ करें। विधि-विधानपूर्वक हनुमान जी की आरती एवं शृंगार करें। हनुमान मंदिर में गुड़-चने का भोग लगाएं।

यदि संतान को कष्ट या नुक्सान हो रहा हो तो नीम का पेड़ लगाएं, रात्रि सिरहाने जल से भरा पात्र रखें एवं सुबह पेड़ में डाल दें।

पितरों का आशीर्वाद लें। बड़े भाई एवं भाभी की सेवा करें, फायदा होगा।

लाल कनेर के फूल, रक्त चंदन आदि डाल कर स्नान करें।

मूंगा, मसूर की दाल, ताम्र, स्वर्ण, गुड़, घी, जायफल आदि दान करें।

मंगल यंत्र बनवा कर विधि-विधानपूर्वक मंत्र जप करें और इसे घर में स्थापित करें।

मंगल मंत्र क्रां क्रीं क्रौं : भौमाया नम:मंत्र के 40000 जप करें या कराएं फिर दशांश तर्पण, मार्जन खदिर की समिधा से हवन करें।

अन्य मंत्र: ''ऊँ अं अगारकाय नम:

मूंगा धारण करें।

मंगलवार के व्रत एक समय बिना नमक बाल भोजन से अथवा फलाहार रह कर करें।

अन्य उपाय : हमेशा लाल रुमाल रखें, बाएं हाथ में चांदी की अंगूठी धारण करें, कन्याओं की पूजा करें और स्वर्ण पहनें, मीठी तंदूरी रोटियां कुत्ते को खिलाएं, ध्यान रखें, घर में दूध उबल कर बाहर गिरे।