Friday, 1 July 2016

गोमेद राहु रत्न यदि जन्म कुण्डली या वर्ष में राहु

गोमेद राहु रत्न   यदि जन्म कुण्डली या वर्ष में राहु अषुभ हो तो शांति के लिए राहु के बीजमंत्र का 18000 की संख्या में जप करें। 
राहु का बीज मंत्र ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
राहु के निमित्त दान वस्तुएं सप्तधान्य तेल स्वर्ण व रजत नाग उड़द तलवार काला वस्त्र व तिल गोमेद नारियल पुष्प मिठाई दक्षिणा इत्यादि।
द्वादश भावों में राहुफल लग्न में राहु हो तो जातक दुष्ट, मस्तक रोगी, स्वार्थी राजद्वेशी, कामी होता है। द्वितीय भाव में हो तो परदेशप्रवासी कम से कम क्रोधी कामी संग्रहशील होता है। तृतीय भाव में हो तो भ्रमणशील दृढ़ विवेकी व्यवसायी होता है। चतुर्थ भाव में हो तो असंतोषी दुखी मातृ क्लेष युक्त, क्रूर कपटी, मुख व उदर रोगी होता है। पंचम भाव में हो तो मतिमंद, धनहीन कुलनाशक कायकर्ता झूठ बोलने वाला शस्त्र प्रिय होता है। छठवें भाव में हो तो पराक्रमी अरिष्ठनाशक कमरदर्द से पीडि़त होता है। सातवें भाव में हो तो स्त्री नाशक भ्रमणशील व दुराचारी, दुष्कर्मी होता है। आठवें भाव में हो तो पुष्ट शरीर गुप्तरोगी क्रोधी व्यर्थभाषी मुख व उदर रोगी होता है। नवम भाव में हो तो आलसी वाचाल अपव्ययी ग्यारहवें भाव में हो तो मंद मति लाभ हीन परिश्रमी, संतान कम होता है। बारहवें भाव में हो तो विवेकहीन मतिमंद मूर्ख परिश्रमी सेवक व हमेषा चिंताशील रहता है।
राहु शांति हेतु उपाय यदि राहु अशुभ फल प्रदान कर रहा हो तो निम्न उपाय करें 
काले व नीले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए। 
प्रतिदिन चपाती पर दही चीनी रखकर कौए व काले कुत्ते को खिलायें।
सात कच्चे कोयले राहु का बीजमंत्र बोलते हुए बहते जल में बहायें।
गोमेद परीक्षण विधि 
गोमेद रत्न शनिवार को अथवा स्वाति, शतभिषा व रवि पुष्य योग आद्र्रा नक्षत्र में पंचधातु अथवा लोहे की अॅंगूठी में धारण करना चाहिए। गोमेद मध्यमा अॅंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के बाद बीजमंत्र का जाप व सप्तधान्य कम्बल का दान करना चाहिए। 
गोमेद धारण करने के लाभ गोमेद धारण करने से मुकदमा वाद-विवाद व धन सम्पत्ति की वृद्धि होती है मुकदमा अपने पक्ष में आता है। 
विशेष जिन जातकों को कुण्डली में राहु 1 4 5 7 9 10 वें भाव में हो उन्हें गोमेद धारण करने से लाभ की प्राप्ति होती है ऊँ ऎं ह्रीं राहवे नम: ऊँ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम: ॐ नीलवर्णाय विद्महे सैंहिकेयाय धीमहि तन्नो राहुः प्रचोदयात् ।
राहुकवचम् II अथ राहुकवचम्
अस्य श्रीराहुकवचस्तोत्रमंत्रस्य चंद्रमा ऋषिः I
अनुष्टुप छन्दः I रां बीजं I नमः शक्तिः I
स्वाहा कीलकम् I राहुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II
प्रणमामि सदा राहुं शूर्पाकारं किरीटिन् II
सैन्हिकेयं करालास्यं लोकानाम भयप्रदम् II १ II
निलांबरः शिरः पातु ललाटं लोकवन्दितः I
चक्षुषी पातु मे राहुः श्रोत्रे त्वर्धशरीरवान् II २ II
नासिकां मे धूम्रवर्णः शूलपाणिर्मुखं मम I
जिव्हां मे सिंहिकासूनुः कंठं मे कठिनांघ्रीकः II ३ II
भुजङ्गेशो भुजौ पातु निलमाल्याम्बरः करौ I
पातु वक्षःस्थलं मंत्री पातु कुक्षिं विधुंतुदः II ४ II
कटिं मे विकटः पातु ऊरु मे सुरपूजितः I
स्वर्भानुर्जानुनी पातु जंघे मे पातु जाड्यहा II ५ II
गुल्फ़ौ ग्रहपतिः पातु पादौ मे भीषणाकृतिः I
सर्वाणि अंगानि मे पातु निलश्चंदनभूषण: II ६ II
राहोरिदं कवचमृद्धिदवस्तुदं यो I
भक्ता पठत्यनुदिनं नियतः शुचिः सन् I
प्राप्नोति कीर्तिमतुलां श्रियमृद्धिमायु
रारोग्यमात्मविजयं च हि तत्प्रसादात् II ७ II
II इति श्रीमहाभारते धृतराष्ट्रसंजयसंवादे द्रोणपर्वणि राहुकवचं संपूर्णं II

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