Friday, 29 April 2016

लहसुनिया केतु रत्न को वैदूर्य व लहसुनिया भी कहते है ।

रत्न परामर्श 
 के लिए सम्पर्क करे ज्ञानचंद बूंदीवाल  M.8275555557 ..
For more information visit 
http://www.gemsforeveryone.com/
https://www.facebook.com/gemsforeveryone/
लहसुनिया केतु रत्न को वैदूर्य व लहसुनिया भी कहते है । अंधेरे में बिल्ली की आँखों के समान चमकता है इस पर तीन सफेद धारियां रहती हैं अतः इस सूत्र मणि भी कहते है। अंगेरजी में इसे कैट'स आई कहते है ।
जिन जातकों की कुण्डली में केतु अशुभ फल प्रदायक हो तो ऐसे जाताकों को केतु के बीजमंत्र का 17000 की संख्या में जाप करना चाहिए व दषमांष हवन भी करना चाहिए।
केतु का बीजमंत्र - ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं सः केतवे नमः
केतु के निमित्त दान वस्तुएं लहसुनिया, लोहा, नारियल, सप्तधान्य, वस्त्र, तिल, तेल, चाकू, मिठाई, दक्षिणा इत्यादि
द्वादश भावों में केतु फल,,,यदि केतु लग्न अथवा प्रथम भाव में हो तो चंचल, मूर्ख, दुराचारी, वृष्चिक राषि का केतु सुखकारक है। द्वितीय भाव मंव हो तो मुख रोगी, गुप्त रोगी, डरपोक होता है। तृतीय भाव में हो तो चंचल, वात रोगी, अघोरी, चण्डाल होता है। चतुर्थ भाव में हो तो चंचल, निरूत्साही, निरूपयोगी होता है। पंचम भाव में हो तो वात रोगी, दुबुर्द्धि होता है। छठवें भाव में हो तो झगड़ालु, प्रेतबाधा से परेषानी, वातरोगी होता है। सप्तम भाव में हो तो मतिमंद, मुर्ख, कायर, डरपोक होता है। आठवें भाव में हो तो तेज हीन, दुष्ट संगति युक्त, सुखहीन होता है। नवम भाव में हो तो कठोर परिश्रमी मजदूर, अपयशी होता है। दसवें भाव में हो तो पितृद्वेषी, मूर्ख, अभिमानी होता है। ग्यारहवें भाव में हो तो बुद्धिहीन, रोगी होता है। बारहवें भाव में हो तो जातक ठग, डकैत व तांत्रिक होता है।
केतु शांति हेतु उपाय-काले तिल व कच्चे कोयला पानी में बहायें।
कुत्ते को नित्य दूध पिलायें या गाय को चारा डालें।
चीटिंयां चुगायें मछलियों को राम नाम की आटेकी गोलियाँ डालें।
लहसुनिया परीक्षण विधि
लहसुनियाँ को यदि हड्डी के ऊपर रख दिया जाए तो 24 घण्टों में यह रतन हड्डी में छेद कर देता है इसके ऊपर जो श्वेत सूत्र है जो बीच में इधर-उधर होते रहते हैं।
लहसुनिया धारण विधि,,,लहसुनियाँ को बुधवार के दिन पंचधातु में मढ़वाकर रवि पुष्य योग, अश्वनी मघा मूल नक्षत्र में कनिष्ठका अंगुली में धारण करें करने के बाद मंत्र जपें व केतु के निमित्त दान दें।
लहसुनिया धारण करने से लाभ-,,,,,लहसुनियाँ धरण करने प्रेत बाधा व भूत बाधा से शांति मिलती है यह शत्रु रोग का नाष करता है।
ॐ नमो अर्हते भगवते श्रीमते पार्श्‍व तीर्थंकराय धरेन्‍द्रयक्ष पद्मावतीयक्षी सहिताय |
ॐ आं क्रों ह्रीं ह्र: केतुमहाग्रह मम दुष्‍टग्रह, रोग कष्‍टनिवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट् || 7000 जाप्‍य ||
मध्‍यम मंत्र -ॐ ह्रीं क्‍लीं ऐं केतु अरिष्‍टनिवारक श्री मल्लिनाथ जिनेन्‍द्राय नम: शान्तिं कुरू कुरू स्‍वाहा || 7000 जाप्‍य ||
लघु मंत्र- ॐ ह्रीं णमो लोए सव्‍वसाहूणं || 10000 जाप्‍य ||
तान्त्रिक मंत्र-ॐ स्‍त्रां स्‍त्रीं स्‍त्रौं स: केतवे नम: || 17000 जाप्‍य ||
रत्न परामर्श 08275555557,,ज्ञानचंद बूंदीवाल,,,https://www.facebook.com/gemsforeveryone/?ref=bookmarks
केतुकवचम् II अथ केतुकवचम्
अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्रमंत्रस्य त्र्यंबक ऋषिः I
अनुष्टप् छन्दः I केतुर्देवता I कं बीजं I नमः शक्तिः I
केतुरिति कीलकम् I केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II
केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम् I
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् II १ II
चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः I
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः II २ II
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः I
पातु कंठं च मे केतुः स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः II ३ II
हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः I
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः II ४ II
ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः I
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः II ५ II
य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् I
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् II ६ II
II इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं संपूर्णं II

No comments:

Post a Comment