Saturday, 30 April 2016

नौ ग्रहों कुंडली के बारह भाव में सूर्य का फल

नौ ग्रहों कुंडली के बारह भाव में सूर्य का फल

रत्न परामर्श 
  के लिए सम्पर्क करे ज्ञानचंद बूंदीवाल  M.8275555557 ..
For more information visit 
http://www.gemsforeveryone.com/
https://www.facebook.com/gemsforeveryone/

लग्न में सूर्य हो तो जातक स्वाभिमानी, क्रोधी, पित्त, वात रोगी, चंचल, प्रवासी, अस्थिर संपत्ति वाला होता है।

 2.कुंडली के दूसरे भाव में सूर्य हो तो संपत्तिवान, भाग्यवान, झगडालू, नेत्र, मुख एवं दंत रोगी, स्त्री के लिए कुटुंब से झगड़ने वाला होता है। 

3. तीसरे भाव में सूर्य हो तो पराक्रमी, प्रतापशाली, राजमान्य, बंधुहीन होता है। 

4. चौथे भाव में सूर्य हो तो जातक चिंताग्रस्त, परम सुंदर, पितृधन नाशक, भाइयों से बैर रखने वाला, गुप्त विद्या प्रिय एवं वाहन का सुख होता है। 

5. पांचवें भाव में सूर्य होने से जातक अल्प संततिवान, सदाचारी, बुद्धिमान एवं क्रोधी होता है। 

6. छठे भाव में सूर्य होने से जातक शत्रुनाशक, तेजस्वी, मातृ कष्टकारक, न्यायवान होता है। 

7. सातवें भाव में सूर्य होने से स्त्री क्लेश कारक, स्वाभिमानी, आत्मरत, चिंतायुक्त होता है।

 8. आठवें भाव में सूर्य होने से पित्त रोगी, क्रोधी, धनी, धैर्यहीन होता है। 

9. नौवें भाव में सूर्य होने से प्रतापी, व्यवसायकुशल, राजमान्य, लब्धप्रतिष्ठित, राजमंत्री, उदार एवं ऐश्वर्य संपन्न होता है। 

10. दसवें भाव में सूर्य होने से स्त्री क्लेश कारक, स्वाभिमानी, आत्मरत, चिंतायुक्त होता है। 

11. सूर्य ग्यारहवें भाव में हो तो जातक धनी, बलवान, सुखी, स्वाभिमानी, मितभाषी, अल्पसंततिवान होता है। 

12. बारहवें भाव में सूर्य हो तो उदासीन, मस्तिष्क रोगी, नेत्र रोगी, आलसी एवं मित्र द्वेषी होता है।

1). पहला खाना : जंगल का एकमात्र राजा सिंह। हुकूमत करने वाला। धर्म पर विश्वास रखता हो या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
सावधानी : इंसाफ पसंद नहीं हैं तो बर्बादी। जरूरी है कि हुक्म चलाते हुए जरूरत से ज्यादा नरमी न बरतें।
2). दूसरा खाना : खुद शिकार करके खाने वाला सिंह। इसे बिना किसी सहारे के जलने वाला मंदिर का दीपक भी कहा गया है।
आर्थिक हालत सामान्य। धर्म और ससुराल विरोधी हो सकते हैं।
सावधानी : तरक्की और सुख-शांति की शर्त यह है कि भाई की हर वक्त सहायता करें।
3). तीसरा खाना : निडर सिंह जिससे मौत भी घबराए। दिल से सच्चा और भलाई करने वाला, लेकिन इस निडरता के चलते ही भाई-बंधुओं के लिए मुसीबत खड़ी करने वाला होता है।
सावधानी : भाइयों के प्रति नरम रुख रखें। सच्चाई पर कायम रहें। झूठ और फरेब से बचें।
4). चौथा खाना : शाही खानदान अर्थात राजयोग के योग होंगे।
सावधानी : गैर स्त्री से ताल्लुक रखे तो पुत्र का जीवन दुखमय बीते। पुत्र नहीं है तो कभी पुत्र पैदा नहीं होगा। माता दुःखी रहेगी।
5). पाँचवाँ खाना : संसार में रुचि लेने वाला मर्यादित राजा। जन्म से ही भाग्यवान। पुत्र पर खर्च करने से पुत्र मालामाल होता जाएगा।
सावधानी : पुत्र से खराब संबंध रखने से बर्बादी के रास्ते खुलने लगेंगे।
6). छठा खाना : जलती हुई जमीन। जिद से खुद के घर को भी जलता हुआ देखकर हँसने वाला जिद्दी। कारोबार में बर्बादी। नाहक लाँछन झेलने वाला।
सावधानी : पिता के प्रति बौर-भाव न रखें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। चरित्र को उत्तम बनाए रखें।
7). सातवाँ खाना : जन्म पर सभी समझते हैं कि खानदान का सूरज निकला, लेकिन जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है वह दुम वाला सितारा बनता जाता है। उसने सब सोच-समझकर नेक नीयत से किया, लेकिन नतीजा उल्टा निकला।
वक्त पर राजा का हुक्म उसके हक में नहीं होता भले ही उसने राजा की जान बचाई हो। बेशक राजगद्दी पर जन्म ले लेकिन गद्दी नसीब नहीं होती। यदि कोई ऐसे व्यक्ति को जलाए तो खुद जलकर नहीं मरेंगे दूसरों को भी जलाकर खाक कर देंगे। अर्थात हम तो डूबे सनम तुमको भी ले डूबेंगे। आमतौर पर ऐसे व्यक्ति का कम कबीला ही होता है।
सावधानी : सुबह और शाम को किसी भी प्रकार का दान न दें।
8). आठवाँ खाना : श्मशान घाट की जलती अग्नि। खोद-खोद चूहा मरे और बैठ जाए भुजंग या आदमी की रोटी कुत्ता खा गया, लेकिन गुरु की गद्दी पर बैठने की ताकत रखने वाला। भंडारी रहे तो भंडारे में कभी कमी नहीं होगी।
सावधानी : रिश्तेदारों से दुश्मनी रखें तो राख जैसा जीवन बन जाए। भिक्षुक बने तो बची हुई रोटी भी हाथ से जाती रहेगी। दूसरे से सहायता की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
9). नौवाँ खाना : भाग्य तब तक सोया रहेगा जब तक धार्मिक गुणों का विकास नहीं होगा लेकिन फिर भी ऐसा व्यक्ति अपने हौसले के दम पर सब कुछ हासिल करने की ताकत रखेगा।
सावधानी : धर्म और ईश्वर निंदा न करें।
10). दसवाँ खाना : पैसा तो खरा है लेकिन बाजार में उसकी कीमत नहीं। लोग उसके सच पर विश्वास नहीं करेंगे इसीलिए दूसरों को माफ न करने वाला। वक्त पर माँ-बाप को भी फाँसी का हुक्म लिखने वाला।
सावधानी : झुकना सीखें। माता-पिता का सम्मान करें अन्यथा यही दुर्गुण मुसीबत में डालने वाला सिद्ध होगा।
11). ग्यारहवाँ खाना : यहाँ स्थित सूर्य को धनवान और राज्य का सेवक माना गया है। गायन और वादन में रुचि रखने वाला पुरुष, परोपकारी व यशस्वी होता है। खुद के ही सुख का ध्यान रखने वाला।
सावधानी : इंसाफ करते समय अहंकार करें तो जिंदगी नर्क बन जाएगी। अहंकारपूर्ण बातों से रुतबा घटेगा और नेकपसंद होने से बढ़ेगा। यदि माँस खाएँ तो औलाद की बर्बादी तय है।
12). बारहवाँ खाना : खामख्‍वाह ही दूसरों की मुसीबत अपने सिर लेने वाला अर्थात पराई आग में जलने वाला व्यक्ति। शय्या सुख की ग्यारंटी नहीं।
सावधानी : यदि धर्म का विरोध करता है तो सोने के समय मुसीबत की खबरें सुनेगा। यदि धर्म और रूहानी शक्ति पर विश्वास करे तो

सुख की नींद सोएगा। तरक्की की शर्त यह है कि साधु की सेवा की जाए। पत्नी का ध्यान रखें
ज्योतिष में कई रत्नों के बारे में बताया गया है। माणिक भी उनमें से एक है। ज्योतिषियों की मानें तो माणिक (रूबी) सूर्य का रत्न है। माणिक देखने में लाल रंग का पारदर्शी पत्थर होता है जिसे सूर्य की धूप में रखने पर अग्नि के समान लपटें निकलती दिखाई देती हैं। माणिक मानसिक संतुलन ठीक रखता है। ज्योतिषियों की मानें तो माणिक पहनने से सूर्य अनुकूल होता है और आपकी तरक्की का मार्ग खोलता है। माणिक को सिंह राशि का रत्न माना जाता है। माणिक को सोने तथा तांबा में पहनना चाहिए। माणिक को मोती के साथ पहना जा सकता है।
माणिक को मोती के साथ पहना जा सकता है। कई ज्योतिषाचार्य पुखराज के साथ माणिक पहनने की सलाह देते हैं। माणिक व पुखराज प्रशासनिक क्षेत्र में उत्तम सफलता का कारक होता है। माणिक व मूंगा भी पहन सकते हैं, ऐसा जातक प्रभावशाली व कोई प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता पाता है। इसे पुखराज, मूंगा के साथ भी पहना जा सकता है। पन्ना व माणिक भी पहन सकते है, इसके पहनने से बुधादित्य योग बनता है। जो पहनने वाले को दिमागी कार्यों में सफल बनाता है। माणिक, पुखराज व पन्ना भी साथ पहन सकते हैं। माणिक के साथ नीलम व गोमेद नहीं पहना जा सकता है।


No comments:

Post a Comment