Saturday, 30 April 2016

नवग्रह शांति के लिए गायत्री मंत्र

नवग्रह शांति के लिए गायत्री मंत्र 
सूर्य गायत्री- ॐ आदित्याय च विधमहे प्रभाकराय धीमहि, तन्नो सूर्य :प्रचोदयात 
चन्द्र गायत्री- ॐ अमृतंग अन्गाये विधमहे कलारुपाय धीमहि,तन्नो सोम प्रचोदयात"|
मंगल गायत्री ॐ अंगारकाय विधमहे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भोम :प्रचोदयात"|
बुध गायत्री- ॐ सौम्यरुपाय विधमहे वानेशाय च धीमहि, तन्नो सौम्य प्रचोदयात"|
गुरु गायत्री- ॐ अन्गिर्साय विधमहे दिव्यदेहाय धीमहि, जीव: प्रचोदयात "|
शुक्र गायत्री ॐ भ्र्गुजाय विधमहे दिव्यदेहाय, तन्नो शुक्र:प्रचोदयात"|
शनि गायत्री- ॐ भग्भवाय विधमहे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात "|
राहू गायत्री- ॐ शिरोरुपाय विधमहे अमृतेशाय धीमहि, तन्नो राहू:प्रचोदयात"|
केतु गायत्री- ॐ पद्म्पुत्राय विधमहे अम्रितेसाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात"|

चन्द्र जब कुण्डली अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है

चन्द्र जब कुण्डली अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है
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नवग्रहों में चन्द्र को रानी का दर्जा प्राप्त है. सूर्य के समान इसकी भी एक राशि है कर्क राशि जो जल तत्व की राशि होती है. इसे मन और चंचलता का कारक माना जाता है. जहां तक इसकी प्रकृति की बात यह है तो यह शांत व सौम्य ग्रह होता है. इसका रंग सफेद होता है. चन्द्रमा जब कुण्डली में किसी अन्य ग्रह के साथ युति सम्बन्ध बनाता है तो कुछ ग्रहों के साथ इसके परिणाम शुभ फलदायी होते हैं तो कुछ ग्रहों के साथ इसकी शुभता में कमी आती है. आपकी कुण्डली में चन्द्रमा किसी ग्रह के साथ युति बनाकर बैठा है तो इसके परिणामों को आप इस प्रकार देख सकते हैं.
चन्द्र व सूर्य की युति,,,,,,,,,,
अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र के साथ सूर्य विराजमान है तो आप कुटनीतिज्ञ होंगे. इस युति के प्रभाव के कारण आपकी वाणी में नम्रता व कोमलता की कमी हो सकती है तथा आप अभिमानी हो सकते हैं जिससे लोगों के प्रति आपका व्यवहार रूखा हो सकता है. इन स्थितियों में सुधार के लिए आपको चन्द्र के उपाय करने चाहिए.
चन्द्र व मंगल की युति ,,,,,,,,,,,,,,
कुण्डली में मंगल के साथ चन्द्र का स्थित होना यह संकेत देता है कि परिणाम की चिंता किए बगैर आप अपने कार्य में जुट जाते हैं जो कभी-कभी आपके लिए परेशानियों का भी कारण बन जाता है. आपकी कुण्डली में चन्द्र मंगल की युति है तो वाणी पर नियंत्रण रखना आपके लिए बहुत ही आवश्यक होता है क्योंकि, बोल चाल में आप आक्रोशित होकर ऐसा कुछ बोल सकते हैं जिनसे लोग आपसे नाराज़ हो सकते हैं.
चन्द्र व बुध की युति,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
चन्द्र के साथ बुध की युति शुभ फल देने वाली होती है. अगर आपकी कुण्डली में इन दोनों ग्रहों की युति बन रही है तो आप कूटनीतिज्ञ हो सकते हैं. अपनी वाणी से लोगों को आसानी से लोगों का दिल जितना आपको अच्छी तरह आता जिससे व्यावसायिक क्षेत्रों में आपको अच्छी सफलता मिलती है.
चन्द्र व गुरू की युति,,,,,,,,,,,
कुण्डली में चन्द्र के साथ गुरू की युति होना यह बताता है कि आप ज्ञानी होंगे. आपको शिक्षक एवं सलाहकार के रूप में अच्छी सफलता मिलेगी. लेकिन, आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि मन में अभिमान की भावना नहीं आये. इसके अलावा आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि बिना मांगे किसी को सलाह न दें क्योंकि बिना मांगे दी गई सलाह के कारण लोग आपसे दूरियां बनाने की कोशिश करेंगे.
चन्द्र व शुक्र की युति,,,,,,,,,,,,,,,
ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में चन्द्रमा शुक्र के साथ युति सम्बन्ध बनाता है वह सौन्दर्य प्रिय होते हैं. अगर आपकी कुण्डली में भी इन दोनों ग्रहों का युति सम्बन्ध बन रहा है तो हो सकता है कि आप अधिक सफाई पसंद व्यक्ति होंगे. कला के क्षेत्रों से आपका लगाव रहेगा. आप लेखन में भी रूचि ले सकते हैं. अत: अलस्य से दूर रहना चाहिए. दिखावे की प्रवृति से भी आपको बचना चाहिए. सुखों की चाहतों के कारण आप थोड़े आलसी हो सकते हैं
चन्द्र व शनि की युति ,,,,,,,,,,,,,,
चन्द्रमा के साथ बैठा शनि यह दर्शाता है कि व्यक्ति ईमानदार, न्यायप्रिय एवं मेहनती है. अगर आपकी कुण्डली में चन्द्र व शनि की यह स्थिति बन रही है तो आप भी परिश्रमी होंगे और मेहनत के दम पर जीवन में कामयाबी की तरफ अग्रसर होंगे. न्यायप्रियता के कारण अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेंगे. इस युति के प्रभाव के कारण कभी-कभी आप निराशावादी हो सकते हैं जिससे मन दु:खी हो सकता है अत: आशावादी बने रहना चाहिए.
चन्द्र व राहु की युति ,,,,,,,,,,,
इन दोनों ग्रहों की युति कुण्डली में होने पर व्यक्ति रहस्यमयी विद्याओं में रूचि रखते हैं. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो शिक्षा प्राप्त कर आप वैज्ञानिक बन सकते हैं. शोध कार्यों में भी आपको अच्छी सफलता मिल सकती है.
चन्द्र व केतु की युति,,,,,,,,,,,,,,
कुण्डली में चन्द्र के साथ केतु की युति होने पर व्यक्ति को समझ पाना कठिन होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति कब क्या कर बैठे यह समझना मुश्किल होता है. अगर आपकी कुण्डली में यह युति बन रही है तो आपके लिए उचित होगा किसी भी कार्य को करने से पूर्व उस पर अच्छी तरह विचार करलें अन्यथा अपने कार्यों के कारण आपका मन दु:खी हो सकता है. वैसे, आपमें अच्छी बात यह है कि अपनी ग़लतियों से सबक लेंगे और अपने आस-पास की बुराईयों को दूर करने की कोशिश करेंगे.

12 राशियों के जातक बारह राशियों के जातक का स्वरूप प्राचीन मंत्रों से जानिए कैसे होते हैं

12 राशियों के जातक बारह राशियों के जातक का स्वरूप  प्राचीन मंत्रों से जानिए कैसे होते हैं 
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 सभी ग्रहों के राजा सूर्य हैं। अन्य ग्रह हैं- चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। विश्व की ज्योतिषीय गणना में नवग्रहों और बारह राशियों का उल्लेख है।


बारह राशियां हैं- मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन। कुंडली के जिस अंक के साथ में चन्द्रमा होता है, उसी अंक पर आने वाली राशि जातक की राशि होती है।

1. मेष राशि के जातक का स्वरूप 

मेष राशि में चन्द्रमा के विद्यमान होने पर जातक के लिए कहा गया है-

लोलनेत्र: सदा रोगी धर्मार्थकृतनिश्चय:।
पृथुघ्ङ: कृतघ्नश्च निष्पापो राजपूजित:।।
कामिनीहृदयानन्दो दाता भीतो जलादपि। 
चण्डकर्मा मृदुश्चान्ते मेषराशौ भवेन्तर:।।

(मानसागरी 1। 266-267)

अर्थात् जिस जातक का जन्म मेष राशि के चन्द्रमा में होता है, वह चंचल नेत्रों वाला, प्राय: रोगी, धर्म और धन दोनों का मूल्यांकन करने वाला, भारी जंघाओं वाला, कृतघ्न, पापरहित, राजा को मान्य, कामिनियों को आनंदित करने वाला, दानी, जल से भयभीत रहने वाला और कठोर कार्य करने वाला परंतु अंत में विनम्र होता है। 

2. वृष राशि के जातक का स्वरूप

जिस जातक का जन्म वृष राशि में विद्यमान चन्द्र में होता है, उसका फल इस प्रकार बताया गया है- 

भोगी दाता शुचिर्दशो महासत्त्वों महाबल:।
धनी विलासी तेजस्वी सुमित्रश्च वृषे भवेत्।।

(मानसागरी 1। 268) 

अर्थात वृष राशि स्थित चन्द्र में जन्म लेने वाला जातक भोगी, दानी, पवित्र, कुशल, सत्त्वसंपन्न, महान् बली, धनवान, भोग-विलासरत, तेजस्वी और अच्छे मित्रों वाला होता है। 

3. मिथुन राशि के जातक का स्वरूप 

मिष्टवाक्यो लोलदृष्टिर्दयालुर्मैथुनप्रिय:।
गान्धर्ववित्कण्ठरोगी कीर्तिभागी धनी गुणी।।
गोरो दीर्घ: पटुर्वक्ता मेधावी च दृढ़व्रत:।
समर्थो न्यायवादी च जायते मिथुने नर:।।

(मानसागरी 1। 269-270) 

अर्थात मिथुन राशि में जन्म लेने वाला जातक मृदुभाषी, चंचल दृष्टि, दयालु, कामुक, संगीतप्रेमी, कंठ रोगी, यशस्वी, धनी, गुणवान, गौरवर्ण एवं लंबे शरीर वाला, कार्यकुशल, वक्ता, बुद्धिमान, दृढ़ संकल्प, सभी प्रकार से समर्थ और न्यायप्रिय होता है। 

4. कर्क राशि के जातक का स्वरूप 

कार्यकारी धनी शूरो धर्मिष्ठो गुरुवत्सल:।
शिरोरोगी महाबुद्धि: कृशाङ्ग: कृत्यवित्तम:।।
प्रवासशील: कोपान्धोऽबलो दु:खी सुमित्रक:।
अनासक्तो गृहे वक्र: कर्कराशौ भवेन्नर:।।

(मानसागरी 1। 271-272)

अर्थात चन्द्र के कर्क राशि में होने पर जो जातक जन्म लेता है, वह जातक कार्य करने वाला, धनवान, शूर, धार्मिक, गुरु का प्रिय, सिर से रोगी, अतीव बुद्धिमान, दुर्बल शरीर वाला, सभी कार्यों का ज्ञाता, प्रवासी, भयंकर क्रोधी, निर्बल, दु:खी, अच्छे मित्रों वाला, गृह में अरुचि रखने वाला तथा कुटिल होता है। 

5. सिंह राशि के जातक का स्वरूप 

क्षमायुक्त: क्रियाशक्तो मद्यमांसरत: सदा।
देशभ्रमणशीलश्च शीतभीत: सुमित्रक:।।
विनयी शीघ्रकोपी च जननीपितृवल्लभ:।
व्यसनी प्रकटो लोके सिंहराशौ भवेन्नर:।। 

(मानसागरी 1। 273-274)

अर्थात सिंह राशि में चन्द्र के विद्यमान होने पर जातक क्षमाशील, कार्य में समर्थ, मद्य-मांस में सदैव आसक्त, देश में भ्रमण करने वाला, शीत से भयभीत, अच्छे मित्रों वाला, विनयशील, शीघ्र क्रुद्ध होने वाला, माता-पिता का प्रिय, व्यसनी (नशा आदि बुरे कार्यों का अभ्यस्त) तथा संसार में प्रख्यात होता है। 

6. कन्या राशि के जातक का स्वरूप 

विलासी सुजनाह्लादी सुभगो धर्मपूरित:।
दाता दक्ष: कविर्वृद्धो वेदमार्गपरायण:।।
सर्वलोकप्रियो नाट्यगान्धर्वव्यसने रत:।
प्रवासशील: स्त्रीदु:खी कन्याजातो भवेन्नर:।। 

(मानसागरी 1। 275-276) 

कन्या राशि में उत्पन्न व्यक्ति विलासी, सज्जनों को आनंदित करने वाला, सुंदर, धर्म से परिपूर्ण, दानी, निपुण, कवि, वृद्ध, वैदिक मार्ग का अनुगामी, सभी लोगों का प्रिय, नाटक, नृत्य और गीत की धुन में आसक्त, प्रवासी एवं स्त्री से दु:खी होता है। 

7. तुला राशि के जातक का स्वरूप 

अस्थानरोषणो दु:खी मृदुभाषी कृपान्वित:।
चलाक्षश्चललक्ष्मीको गृहमध्येऽतिविक्रम:।।
वाणिज्यदक्षो देवानां पूजको मित्रवत्सल:।
प्रवासी सुहृदामिष्टस्तुलाजातो भवेन्नर:।। 

(मानसागरी 1। 277-278) 

तुला राशि में उत्पन्न व्यक्ति अकारण क्रोध करने वाला, दु:खी, मधुरभाषी, दयालु, चंचल नेत्रों एवं अस्थिर धन वाला, घर में ही पराक्रम दिखाने वाला, व्यापार में चतुर, देवताओं का पूजन करने वाला, मित्रों के प्रति दयालु, परदेशवासी तथा मित्रों का प्रिय पात्र होता है। 

8. वृश्चिक राशि के जातक का स्वरूप 

बालप्रवासी क्रूरात्मा शूर: पिङ्गललोचन:।
परदाररतो मानी निष्ठुर: स्वजने भवेत्।।
साहसप्राप्तलक्ष्मीको जनन्यामपि दुष्टधी:।
धूर्तश्चौरकलारम्भी वृश्चिके जायते नर:।।

(मानसागरी 1। 279-280) 

वृश्चिक राशि में उत्पन्न व्यक्ति बाल्यावस्था से ही परदेश में रहने वाला, क्रूर स्वभाव वाला, शूर, पीले नेत्रों वाला, परस्त्री में आसक्त, अभिमानी, अपने भाई-बंधुओं के प्रति निर्दयी, अपने साहस से धन प्राप्त करने वाला, अपनी माता के प्रति भी दुष्ट बुद्धि वाला, धूर्तता और चोरी की कला का अभ्यास करने वाला होता है। 

9. धनु राशि के जातक का स्वरूप 

शूर: सत्यधिया युक्त: सात्त्विको जननन्दन:।
शिल्पविज्ञानसम्पन्नो धनाढ्यो दिव्यभार्यक:।।
मानी चरित्रसम्पन्नो ललिताक्षरभाषक:।
तेजस्वी स्थूलदेहश्च धनुर्जात: कुलान्तक:।। 

(मानसागरी 1। 281-282) 

यदि धनुराशिगत जन्म हो तो शूर, सत्य बुद्धि से युक्त, सात्त्विक, मनुष्यों के हृदय को आनंदित करने वाला, शिल्प (मूर्तिकला)-विज्ञान से संपन्न, धन से युक्त, सुन्दर स्त्री वाला, अभिमानी, चरित्रवान, सुंदर शब्दों को बोलने वाला, तेजस्वी, मोटे शरीर वाला तथा कुल का नाशक होता है। 

10. मकर राशि के जातक का स्वरूप 

कुले नष्टो वश: स्त्रीणां पण्डित: परिवादक:।
गीतज्ञो ललिताग्राह्यो पुत्राढ्यो मातृवत्सल:।।
धनी त्यागी सुभृत्यश्च दयालुर्बहुबान्धव:।
परिचिन्तितसौख्यश्च मकरे जायते नर:।। 

(मानसागरी 1। 283-284) 

मकर राशि में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने कुल में नष्ट (सबसे हीन अवस्था वाला), स्त्रियों के वशीभूत, विद्वान, परनिंदक, संगीतज्ञ, सुंदर स्त्रियों का प्रिय पात्र, पुत्रों से युक्त, माता का प्रिय, धनी, त्यागी, अच्छे नौकरों वाला, दयालु, बहुत भाइयों (परिवार) वाला तथा सुख के लिए अधिक चिंतन करने वाला होता है। 

11. कुंभ राशि के जातक का स्वरूप 

दातालस: कृतज्ञश्च गजवाजिधनेश्वर:।
शुभदृष्टि: सदा सौम्यो धनविद्याकृतोद्यम:।।
पुण्याढ्य स्नेहकीर्तिश्च धनभोगी स्वशक्तित:।
शालूरकुक्षिर्निर्भीक: कुम्भे जातो भवेन्नर:।। 

(मानसागरी 1। 285-286) 

यदि कुंभ राशि में जन्म हो तो मनुष्य दानी, आलसी, कृतज्ञ, हाथी, घोड़ा और धन का स्वामी, शुभ दृष्टि एवं सदैव कोमल स्वभाव वाला, धन और विद्या हेतु प्रयत्नशील, पुत्र से युक्त, स्नेहयुक्त, यशस्वी, अपनी शक्ति से धन का उपभोग करने वाला तथा निर्भीक होता है। 

12. मीन राशि के जातक का स्वरूप 

गम्भीरचेष्टित शूर: पटुवाक्यो नरोत्तम:।
कोपन: कृपणो ज्ञानी गुणश्रेष्ठ: कुलप्रिय:।।
नित्यसेवी शीघ्रगामी गान्धर्वकुशल: शुभ:।
मीनराशौ समुत्पन्नौ जायते बन्धुवत्सल:।। 

(मानसागरी 1। 287-288) 

जिसका जन्म मीन राशि में होता है, वह गंभीर चेष्टा करने वाला, शक्तिशाली, बोलने में चतुर, मनुष्यों में श्रेष्ठ, क्रोधी, कृपण, ज्ञानसंपन्न, श्रेष्ठ गुणों से युक्त, कुल में प्रिय, नित्य सेवाभाव रखने वाला, शीघ्रगामी, नृत्य-गीतादि में कुशल, शुभ दर्शन वाला तथा भाई-बंधुओं का प्रेमी होता है। 

कुंडली के 12 भाव ,,,, एक परिचय किस भाव से क्या पहचानें

 कुंडली के 12 भाव ,,,, एक परिचय किस भाव से क्या पहचानें 
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 प्रथम भाव से जातक की शारीरिक स्थिति, स्वास्थ्य, रूप, वर्ण, चिह्न, जाति, स्वभाव, गुण, आकृति, सुख, दु:ख, सिर, पितामह तथा शील आदि का विचार करना चाहिए।

 द्वितीय भाव से धनसंग्रह, पारिवारिक स्थिति, उच्च विद्या, खाद्य-पदार्थ, वस्त्र, मुखस्थान, दाहिनी आंख, वाणी, अर्जित धन तथा स्वर्णादि धातुओं का संचार होता है।

 तृतीय भाव से पराक्रम, छोटे भाई-बहनों का सुख, नौकर-चाकर, साहस, शौर्य, धैर्य, चाचा, मामा तथा दाहिने कान का विचार करना चाहिए।

 चतुर्थ भाव से माता, स्थायी संपत्ति, भूमि, भवन, वाहन, पशु आदि का सुख, मित्रों की स्थिति, श्वसुर तथा हृदय स्थान का विचार करना चाहिए।

 पंचम भाव से विद्या, बुद्धि, नीति, गर्भ स्थिति, संतान, गुप्त मंत्रणा, मंत्र सिद्धि, विचार-शक्ति, लेखन, प्रबंधात्मक योग्यता, पूर्व जन्म का ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, प्रेम-संबंध, इच्छाशक्ति आदि का विचार करना चाहिए।

 षष्ठ भाव से शत्रु, रोग, ऋण, चोरी अथवा दुर्घटना, काम, क्रोध, मद, मोह, लोभादि विकार, अपयश, मामा की स्थिति, मौसी, पापकर्म, गुदा स्थान तथा कमर संबंधी रोगों का विचार करना चाहिए।

 सप्तम भाव से स्त्री एवं विवाह सुख, स्त्रियों की कुंडली में पति का विचार, वैवाहिक सुख, साझेदारी के कार्य, व्यापार में हानि, लाभ, वाद-विवाद, मुकदमा, कलह, प्रवास, छोटे भाई-बहनों की संतानें, यात्रा तथा जननेन्द्रिय संबंधी गुप्त रोगों का विचार करना चाहिए।

 अष्टम भाव से मृत्यु तथा मृत्यु के कारण, आयु, गुप्त धन की प्राप्ति, विघ्न, नदी अथवा समुद्र की यात्राएं, पूर्व जन्मों की स्मृति, मृत्यु के बाद की स्थिति, ससुराल से धनादि प्राप्त होने की स्थिति, दुर्घटना, पिता के बड़े भाई तथा गुदा अथवा अण्डकोश संबंधी गुप्त रोगों का विचार करना चाहिए।

 नवम भाव से धर्म, दान, पुण्य, भाग्य, तीर्थयात्रा, विदेश यात्रा, उत्तम विद्या, पौत्र, छोटा बहनोई, मानसिक वृत्ति, मरणोत्तर जीवन का ज्ञान, मंदिर, गुरु तथा यश आदि का विचार करना चाहिए।

 दशम भाव से पिता, कर्म, अधिकार की प्राप्ति, राज्य प्रतिष्ठा, पदोन्नति, नौकरी, व्यापार, विदेश यात्रा, जीविका का साधन, कार्यसिद्धि, नेता, सास, आकाशीय स्थिति एवं घुटनों का विचार करना चाहिए।

 एकादश भाव से आय, बड़ा भाई, मित्र, दामाद, पुत्रवधू, ऐश्वर्य-संपत्ति, वाहनादि के सुख, पारिवारिक सुख, गुप्त धन, दाहिना कान, मांगलिक कार्य, भौतिक पदार्थ का विचार करना चाहिए।


 द्वादश भाव से धनहानि, खर्च, दंड, व्यसन, शत्रु पक्ष से हानि, बायां नेत्र, अपव्यय, गुप्त संबंध, शय्या सुख, दु:ख, पीड़ा, बंधन, कारागार, मरणोपरांत जीव की गति, मुक्ति, षड्यंत्र, धोखा, राजकीय संकट तथा पैर के तलुए का विचार करना चाहिए। 

नवग्रह और ग्रहों से होने वाली परेशानियां इस प्रकार हैं

 नवग्रह और ग्रहों से होने वाली परेशानियां  इस प्रकार हैं                  
सूर्य  1 सरकारी नौकरी या सरकारी कार्यों में परेशानी, सिर दर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, अस्थि रोग, चर्म रोग, पिता से अनबन आदि।
चंद्र  2 मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, कफ, सर्दी, जुकाम, मूत्र रोग, स्त्रियों को मासिक धर्म, निमोनिया।
मंगल 3 अधिक क्रोध आना, दुर्घटना, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, बवासीर, भाइयों से अनबन आदि।
बुध  4 गले, नाक और कान के रोग, स्मृति रोग, व्यवसाय में हानि, मामा से अनबन आदि।
गुरु 5  धन व्यय, आय में कमी, विवाह में विलम्ब, संतान बाधा, उदर विकार, गठिया, कब्ज, गुरु व देवता में अविश्वास आदि।
शुक्र 6  जीवन साथी के सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, भौतिक सुखों में कमी व अरुचि, नपुंसकता, मधुमेह, धातु व मूत्र रोग आदि।
शनि 7  वायु विकार, लकवा, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, पैरों में दर्द, नौकरी में परेशानी आदि।
राहु 8  त्वचा रोग, कुष्ठ, मस्तिष्क रोग, भूत प्रेत वाधा, दादा से परेशानी आदि।
केतु 9  नाना से परेशानी, भूत-प्रेत, जादू टोने से परेशानी, रक्त विकार, चेचक आदि।
 ग्रहों के कारकत्व को ध्यान में रखते हुए उपाय करना चाहिए।

नौ ग्रहों के बारह भाव में फल कुंडली के हर भाव में छुपा है राज

नौ ग्रहों के बारह भाव में फल कुंडली के हर भाव में छुपा है राज
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बारह भावों की रचनाकी गई है। प्रत्येक भाव, मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को
दर्शाता है। आइए इनके बारे में विस्तार से जानें। 
1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि,
वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास,
अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है।
2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति,
परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आँख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक
शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है।
3. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे
भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि
का विचार किया जाता है।
4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्य,
वाहन सौख्य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र, छाती पेट के रोग, मानसिक स्थिति
आदि का विचार किया जाता है।
5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला
सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य
शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि
का विचार किया जाता है।
6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के शत्रु , रोग,
भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का
विचार किया जाता है।
7.सातवाँ भाव : विवाह सुख, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार,
पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान
इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं।
8 .आठवाँ भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख,
आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का
पता चलता है।
9 .नवाँ भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय,
बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी,
दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है।
10. दसवाँ भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक
सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द,
सासू माँ आदि के बारे में पता चलता है।
11. ग्यारहवाँ भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जँवाई,
भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है।
12. बारहवाँ भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन,
संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल
यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है।

केतु का फल कुंडली के बारह भाव में

 केतु का फल   कुंडली के बारह भाव में
 लग्न में केतु हो तो जातक चंचल, भीरू, दुराचारी तथा वृश्चिक राशि में हो तो सुखकारक, धनी एवं परिश्रमी होता है।2. दूसरे भाव में हो तो राजभीरू, विरोधी होता है। 3. तीसरे भाव में केतु हो तो चंचल, वात रोगी, व्यर्थवादी होता है। 4. चौथे भाव में हो तो चंचल, वाचाल, निरुत्साही होता है। 5. पांचवें भाव में हो तो कुबुद्धि एवं वात रोगी होता है। 6. छठे भाव में हो तो वात विकारी, झगड़ालु, मितव्ययी होता है। 7. सातवें भाव में हो तो मतिमंद, शत्रुभीरू एवं सुखहीन होता है। 8. आठवें भाव में हो तो दुर्बुद्धि, तेजहीन, स्त्री द्वैषी एवं चालाक होता है। 9. नौवें भाव में हो तो सुखभिलाषी, अपयशी होता है। 10. दसवें भाव में हो तो पितृ द्वैषी, भाग्यहीन होता है।11. इस स्थान में केतु हर प्रकार का लाभ देता है। जातक भाग्यवान, विद्वान, उत्तम गुणों वाला, तेजस्वी एवं उदर रोग से पीड़‍ित रहता है। 12. इस भाव में केतु हो तो उच्च पद वाला, शत्रु पर विजय पाने वाला, बुद्धिमान, धोखा देने वाला तथा शक्की मिजाज होता है।

राहु का फल कुंडली के बारह भाव में

 राहु का फल  कुंडली के बारह भाव में
 लग्न में राहु हो तो जातक दुष्ट, मस्तिष्क रोगी, स्वार्थी, राजद्वेषी, कामी एवं अल्पसंतति वाला होता है। 2. दूसरे भाव में राहु हो तो परदेशगामी, अल्पसंतति, अल्प धनवान होता है। 3. तीसरे भाव में राहु हो तो बलिष्ठ, विवेकयुक्त, प्रवासी, विद्वान एवं व्यवसायी होता है। 4. चौथे भाव में हो तो असंतोषी, दुखी, मातृ क्लेशयुक्त, क्रूर, कपटी एवं व्यवसायी होता है। 5. पांचवें भाव में हो तो उदर रोगी, मतिमंद, धनहीन, भाग्यवान एवं शास्त्र प्रिय होता है। 6. छठे भाव में विधर्मियों द्वारा लाभ, निरोग, शत्रुहंता, कमर दर्द पीड़ित, अरिष्ट निवारक एवं पराक्रमी होता है। 7. सातवें भाव में हो तो स्त्री नाशक, व्यापार में हानिदायक, भ्रमणशील, वातरोग जनक, लोभी एवं दुराचारी होता है। 8. आठवें भाव में राहु हो तो पुष्टदेही, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, उदर रोगी एवं कामी होता है। 9. नौवें भाव में राहु हो तो प्रवासी, वात रोगी, व्यर्थ परिश्रमी, तीर्थाटनशील, भाग्यहीन एवं दुष्ट बुद्धि होता है। 10. दसवें भाव में राहु हो तो आलसी, वाचाल, मितव्ययी, संततिक्लेशी तथा चंद्रमा से युत हो तो राजयोग कारक होता है। 11. ग्यारहवें भाव में राहु हो तो मंदमति, लाभहीन, परिश्रमी, अल्प संततियुक्त, अरिष्ट नाशक एवं सफल कार्य करने वाला होता है। 12. बारहवें भाव में राहु हो तो विवेकहीन, मतिमंद, मूर्ख, परिश्रमी, सेवक, व्ययी, चिंतनशील एवं कामी होता है।

शनि का फल कुंडली के बारह भाव में

 शनि का फल कुंडली के बारह भाव में
 लग्न में शनि मकर तथा तुला का हो तो जातक धनाढ्य, सुखी और अन्य राशियों का हो तो दरिद्रवान होता है।2. दूसरे भाव में हो तो कटुभाषी और कुंभ या तुला का शनि हो तो धनी, कुटुंब तथा भ्रातृवियोगी, लाभवान होता है। 3. तीसरे भाव में हो तो निरोगी, योगी, विद्वान, चतुर, विवेकी, शत्रुहंता होता है। 4. चौथे भाव में हो तो बलहीन, अपयशी, शीघ्रकोपी, धूर्त, भाग्यवान होता है। 5. पांचवें भाव में हो तो वात रोगी, भ्रमणशील, विद्वान, उदासीन, संतानयुक्त एवं चंचल होता है। 6. छठे भाव में शनि हो तो शत्रुहंता, कवि, भोगी, कंठ व श्वांस रोगी, जातिविरोधी होता है। 7. सातवें भाव में हो तो क्रोधी, धनहीन, सुखहीन, भ्रमणशील, स्त्रीभक्त, विलासी एवं कामी होता है।8. आठवें भाव में हो तो कपटी, वाचाल, डरपोक, धूर्त एवं उदार प्रवृत्ति का होता है। 9. नौवें भाव में हो तो प्रवासी, धर्मात्मा, साहसी, भ्रातृहीन एवं शत्रुनाशक होता है। 10. दसवें भाव में हो तो नेता, न्यायी, विद्वान, ज्योतिषी, अधिकारी, महत्वाकांक्षी एवं धनवान होता है। 11. ग्यारहवें भाव में हो तो दीर्घायु, क्रोधी, चंचल, शिल्पी, सुखी, योगी, पुत्रहीन एवं व्यवसायी होता है।12. बारहवें भाव में शनि हो तो जातक व्यसनी, दुष्ट, कटुभाषी, अविश्वासी, मातृ कष्टदायक, अल्पायु एवं आलसी होता है

शुक्र का फल कुंडली के बारह भाव में

 शुक्र का फल  कुंडली के बारह भाव में
 लग्न में शुक्र हो तो जातक दीर्घायु सुंदर, ऐश्वर्यवान, मधुर भाषी, भोगी, विलासी, प्रवासी और विद्वान होता है। 2. दूसरे भाव शुक्र हो तो धनवान, यशस्वी, साहसी, कवि एवं भाग्यवान होता है। 3. तीसरे भाव में शुक्र हो तो धनी, कृपण, आलसी, चित्रकार, पराक्रमी, विद्वान, भाग्यवान एवं पर्यटनशील होता है। 4. चौथे भाव में शुक्र हो तो जातक बलवान, परोपकारी, आस्तिक, सुखी, भोगी, पुत्रवान एवं दीर्घायु होता है। 5. पांचवें भाव में शुक्र हो तो सद्गुणी, न्यायप्रिय, आस्तिक, दानी, प्रतिभाशाली, वक्ता एवं व्यवसायी होता है। 6. छठे भाव में शुक्र हो तो जातक स्त्री सुखहीन, बहुमित्रवान, दुराचारी, वैभवहीन एवं मितव्ययी होता है। 7. सातवें भाव में शुक्र हो तो स्त्री से सुखी, उदार, लोकप्रिय, धनिक, विवाह के बाद भाग्योदयी, अल्पव्याभिचारी एवं विलासी होता है। 8. आठवें भाव में शुक्र हो तो निर्दयी, रोगी, क्रोधी, ज्योतिषी, मनस्वी, पर्यटनशील एवं परस्त्रीरत होता है। 9. नौवें भाव में शुक्र हो तो आस्तिक, गृहसुखी, प्रेमी, दयालु, तीर्थस्थानों की यात्रा करने वाला, राजप्रिय एवं धर्मात्मा होता है। 10. दसवें भाव में शुक्र हो तो विलासी, ऐश्वर्यवान, न्यायवान, धार्मिक, गुणवान एवं दयालु होता है। 11. ग्यारहवें भाव में शुक्र हो तो जातक विलासी, वाहनसुखी, स्थिर लक्ष्मीवान, परोपकारी, धनवान, कामी एवं पुत्रवान होता है। 12. बारहवें भाव में शुक्र हो तो न्यायशील, आलसी, पतित, परस्त्रीरत, धनवान एवं मितव्ययी होता है।

गुरु का फल कुंडली के बारह भाव में

गुरु का फल   कुंडली के बारह भाव में 
 जिस जातक के लग्न में गुरु (बृहस्पति) होता है। ऐसा जातक अपने गुणों से चारों ओर आदर की दृष्टि से देखा जाता है। 2. दूसरे भाव में हो तो जातक कवि होता है। उसमें राज्य संचालन करने की शक्ति हो‍ती है। 3. तीसरे भाव में हो तो वह जातक नीच स्वभाव का बना देता है। साथ ही उसे सहोदर भ्राताओं का सुख भी प्राप्त होता है। 4. चौथे भाव में हो तो व्यक्ति लेखक, प्रवासी, योगी, आस्तिक, कामी, पर्यटनशील तथा विदेश प्रिय तथा महिलाओं के पीछे-पीछे घूमने वाला होता है। 5. पांचवे भाव में हो तो ऐसा जातक विलासी तथा आराम प्रिय होता है। 6. छठे भाव में हो तो ऐसा जातक सदा रोगी रहता है। मुकदमें आदि में जीत हासिल करता है। तथा अपने शत्रुओं को मुंह के बल गिराने की क्षमता रखता है। 7. सातवें भाव में हो तो बुद्धि श्रेष्ठ होती है। ऐसा व्यक्ति भाग्यवान, नम्र, धैर्यवान होता है। 8. आठवें भाव में हो तो दीर्घायु होता है तथा ऐसा जातक अधिक समय तक पिता के घर में नहीं रहता है। 9. नौवें भाव में हो तो सुंदर मकान का निर्माण करवाता है। ऐसा जातक भाई-बंधुओं से स्नेह रखने वाला होता है तथा राज्य का प्रिय होता है। 10. दसवें भाव में हो तो जातक को भूमिपति एवं भवन प्रेमी बना देता है। ऐसे व्यक्ति चित्रकला में निपुण होते है। 11. ग्यारहवें भाव में हो तो जातक ऐश्वर्यवान, पिता के धन को बढ़ाने वाला, व्यापार में दक्षता लिए होता है। 12. बारहवें भाव में हो तो ऐसा जातक आलसी, कम खर्च करने वाला, दुष्ट स्वभाव वाला होता है। लोभ‍ी-लालची भी होता है।

बुध का फल कुंडली के बारह भाव में

 बुध का फल  कुंडली के बारह भाव में
 जिस जातक के लग्न में बुध होता है वह अपने पूरे जीवन को व्यवस्थित करता हुआ उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उसकी बुद्धि श्रेष्ठ होती है। उसका शरीर स्वर्ण के समान कांतिवाला और वह प्रसन्नचित्त प्राणी होता है। ऐसा व्यक्ति दीर्घायु, गणितज्ञ, विनोदी, उदार व मितभाषी होता है। 2. दूसरे भाव में हो तो वह बुद्धिमान तथा परिश्रमी होता है। सभा आदि में भाषण द्वारा वह जनता को मंत्रमुग्ध कर सकता है। 3. तीसरे भाव में हो तब ऐसा व्यक्ति व्यापारी से मित्रता स्थापित करने वाला होता है। व्यापारादि कार्यों में उसकी बहुत रुचि होती है।4. चौथे भाव में हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है। राज्य में उसकी प्रतिष्ठा तथा मित्रों से सम्मान होता है। 5. पांचवे भाव में हो तो उसे संतान सुख का अभाव रहता है। यदि होता भी है तो वृद्धावस्था में पुत्र लाभ प्राप्त होता है। 6. छठे भाव में हो तो उसका अन्य मनुष्यों के साथ विरोध रहता है। 7. सातवें भाव में हो तो वह स्त्री के लिए सुखदायक होता है। 8. आठवें भाव में हो तो उस व्यक्ति की उम्र लंबी होती है। यह देश-विदेश में भी ख्याति लाभ दिलाता है। 9. नौवें भाव में हो तो मनुष्य धार्मिक कार्यों में रुचि लेने वाला, बुद्धिमान, तीर्थ आदि करने वाला होता है। तथा घर का कुलदीपक भी होता हैं। 10. दसवें भाव में हो तो ऐसा जातक पिता द्वारा अर्जित धन प्राप्त करता है। 11. ग्यारहवें भाव में हो तो वह व्यक्ति को बहुत सारी संपत्ति का मालिक बनाता है। ऐसा व्यक्ति लेखक या कवि भी होता है। 12. बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति विद्वान होते हुए भी आलसी होता है।

मंगल का फल कुंडली के बारह भाव में

मंगल का फल  कुंडली के बारह भाव में 
 लग्न में मंगल हो तो जातक क्रूर, साहसी, चपल, महत्वाकांक्षी एवं व्रणजन्य कष्ट से युक्त एवं व्यवसाय में हानि होती है। 2. दूसरे भाव में मंगल हो तो कटुभाषी, धनहीन, पशुपालक, धर्मप्रेमी, नेत्र एवं कर्ण रोगी होता है। 3. तीसरे भाव में मंगल हो तो जातक प्रसिद्ध शूरवीर, धैर्यवान, साहसी, भ्रातृ कष्टकारक एवं कटुभाषी होता है। 4. चौथे भाव में मंगल हो तो वाहन सुखी, संततिवान, मातृ सुखहीन, प्रवासी, अग्नि भययुक्त एवं लाभयुक्त होता है। 5. पांचवें स्थान में मंगल हो तो जातक उग्रबुद्धि, कपटी, व्यसनी, उदर रोगी, चंचल, बुद्धिमान होता है।6. छठे भाव में हो तो बलवान, धैर्यशाली, शत्रुहंता एवं अधिक व्यय करने वाला होता है। 7. सातवें भाव में मंगल हो तो स्त्री दुखी, वात रोगी, शीघ्र कोपी, कटुभाषी, धननाशक एवं ईर्ष्यालु होता है। 8. आठवें भाव में मंगल हो तो जातक व्याधिग्रस्त, व्यसनी, कठोरभाषी, उन्मत्त, नेत्र रोगी, संकोची एवं धन चिंतायुक्त होता है। 9. मंगल नौवें स्थान में हो तो द्वैषी, अभिमानी, क्रोधी, नेता, अधिकारी, ईर्ष्यालु एवं अल्प लाभ करने वाला होता है। 10. मंगल दसवें भाव में हो तो धनवान, कुलदीपक, सुखी, यशस्वी, उत्तम वाहनों का सुख पाने वाला लेकिन संततिकष्ट वाला होता है।11. ग्यारहवें भाव में मंगल हो तो जातक कटुभाषी, क्रोधी, लाभ करने वाला, साहसी, प्रवासी एवं धैर्यवान होता है। 12. बारहवें भाव में मंगल हो तो जातक नेत्र रोगी, स्त्री नाशक, उग्र, व्ययशील एवं ऋणी होता है।